सोमवार, 29 दिसंबर 2008

ऐ ‘दाग़’ तुम तो बैठ गए एक आह में

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कुछ फ़नकार ऐसे होते हैं जिनकी शरण हम बार-बार जाते हैं। ऐसे कलाकारों की मेरी फ़ेहरिस्त थोड़ी लंबी है। रफ़ी और तलत साहब इसी श्रेणी में आते हैं। जब ग़ज़लों की बात आती है तो उस्ताद मेहदी हसन साहब और फ़रीदा आपा भी ऐसे फ़नकार हैं जिनकी ओर जाने का बार-बार मन करता है।

जब वैक्यूम में होता हूँ तो कानफ़ोड़ू संगीत सुनता हूँ और हिन्दुस्तानी संगीत की ओर झांकता तक नहीं। दो महीने ऐसे ही काटने के बाद आज दिनभर बेग़म अख़्तर के गीत सुनता रहा। अभी खयाल आया फ़रीदा आपा की मेरी एक बेहद पसंदीदा गज़ल का।

आप भी सुनिये मनीबैक गारंटी के साथ।


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आफ़त की शोखियाँ हैं तुम्हारी निगाह में
महशर के फ़ितने खेलते हैं जल्वागाह में।

वो दुश्मनी से देखते हैं, देखते तो हैं
मैं शाद हूँ कि हूँ तो किसी की निगाह में।

आती है बात बात मुझे याद बार-बार
कहता हूँ दौड़-दौड़ के क़ासिद से राह में।

इस तौबा पर है नाज़ मुझे ज़ाहिद इस क़दर
जो टूट कर शरीक हूँ हाल-ए-तबाह में।

मुश्ताक़ इस अदा के बहुत दर्दमंद थे
ऐ ‘दाग़’ तुम तो बैठ गए एक आह में।

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

हीरे नी रांझा जोगी हो गया

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ऐसा बिरले ही होता है कि हम यहां पर एक ही कलाकार को छोटे अंतराल पर दोबार लाएं, मगर कैलाश खेर के लिये मैनें अपवाद रख छोड़ा है। वह इसलिये क्योंकि एक कलाकार को या एक तरह के संगीत को भी मैं लगातार ज़्यादा दिनों तक नहीं सुनता, मगर यहां भी अपवाद बन गया है।



पिछले महीने भर से मैं लगातार कैलाश के 10-12 गाने बार-बार सुन रहा हूँ और उनमें से भी दो गाने जो मुझे बेहद पसंद आए: पहला नैहरवा और दूसरा जो नीचे लगा रहा हूँ। नैहरवा मैनें कुछ समय पहले ही यहां लगाया था। यह गीत दरअसल दो-तीन लोकगीतों का घालमेल है और फ़्यूज़न होने के बावजूद मुझे बेहद अच्छा लगा।



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शनिवार, 20 दिसंबर 2008

चांन जैहे मुखड़े ते गिठ-गिठ लालियां

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आसा सिंह मस्ताना को भले ही कई लोग नहीं जानते हों मगर इतना तय है कि जो गीत मेरे पास है उसे सबने कभी न कभी ज़रूर सुना होगा। अगर अपनी एक पूर्व-सहकर्मी को कोट करूं तो आसा सिंह "ब्लैक एंड वाइट गीत" गाने वाले गायक थे। मुझे तो उनकी आवाज़ कई बार रफ़ी साहब से मेल खाती भी लगती है। खैर, इसकी वजह यह है कि इनकी आवाज़ में भी वही मुलायमियत महसूस होती है जो रफ़ी साहब की आवाज़ में। 
पंजाब में संभवत: उनका रुतबा रफ़ी साहब वाला ही रहा हो। वे पंजाब के इतने घरेलू गायक थे कि शादी-ब्याह में भी गाने से गुरेज़ नहीं करते थे। इनके कुछ और गीत बाद में यहां लाने का विचार है। बहरहाल यह गीत सुनिये।



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शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008

शिव बटालवी - अज दिन चड्या तेरे रंग वरगा

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शिव बटालवी कोई नया नाम नहीं है। हालांकि मैं पंजाबी नहीं समझता और आजतक शिव के गीतों का कोई अनुवाद भी मेरे हाथ नहीं पड़ा, मगर जो भी छुटपुट पढ़ पाया हूँ उससे इस कवि की महत्ता पता चलती है। पंजाब में शिव घरेलू नाम है और उनके गीतों को जगजीत, नुसरत, हंस राज हंस जैसे कई लोगों ने स्वर दिया है।
पिछले दिनों मेरे हाथ शिव का हंस राज हंस का गाया एक गीत पड़ा जो मुझे अपनी कर्णप्रियता के कारण पसंद है। मतलब रत्तीभर भी समझ नहीं आता मगर अच्छा लगता है सो सुनता रहता हूँ।


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बुधवार, 3 दिसंबर 2008

नैहरवा

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मुंबई में जो हुआ उससे दिल तो टूटा ही मगर उससे भी ज़्यादा तकलीफ़ अपने प्यारे नेताओं के ढंग देखकर हुई। मैं राजनीति से इस कदर दूर रहता हूँ कि उस बारे में पढ़ता तक नहीं हूँ, मगर इस मर्तबा पुलिस, एन एस जी और आतंकवादियों के बीच चल रही गोलाबारी के इतर जो देशभर में हमारे नेता गुल खिला रहे थे, उसने मुझे मजबूर किया कि मैं हर खबर पढ़ता रहा, यहां तक कि सिर्फ़ इसी बारे में बात करता रहा और दफ़्तर में काम के दबाव में नेट पर भी लगातार पढ़ता रहा।
ज़ाहिर है, लाखों लोगों ने यही किया और इससे उनकी तकलीफ़ बढ़ी ही। मगर इससे लोगों में एक जुड़ाव मुझे दिखा। इस सबसे जो बेचैनी बढ़ी उसे कम करने के लिये मैनें यूँहीं कैलाश खेर को सुनना शुरु किया और हैरान रह गया कि किस दरजे का गायक हमारे बीच मौजूद है। मैं आजकल का संगीत नहीं सुनता और सुनता भी हूँ तो वह मुझे अपील नहीं करता। मगर जब नैहरवा और कैलाश के गाए कुछ और गीत सुने तो मेरी चौंकने की बारी थी। इस दौरान मैं नैहरवा और वैसा ही कुछ कैलाश द्वारा गाया सुनता रहा। कबीर का लिखा है इसलिये बार बार लगता है कि इसका कोई छोर मुंबई जाकर ज़रूर लगता है। सुनकर देखिये, आपको भी राहत मिलेगी।


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शनिवार, 11 अक्तूबर 2008

बाइलेस दे ओरो

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स्पेनी संगीत ने पन्द्रहवीं शताब्दी में गिटार के अविष्कार से लेकर आज तक एक लंबा सफ़र तय किया है और यह अनायास ही नहीं कि विश्वभर में जब लोकप्रिय संगीत की बात चलती है तो स्पेनी गीतों की चर्चा ज़रूर होती है और भाषा की दीवार भी अपने-आप ही पार हो जाती है। आज लोकप्रिय संगीत के बड़े नामों में स्पेनी भाषा के कई नाम शुमार हैं।

खैर यह चर्चा चलाने से बेहतर होगा कि मैं आपके और संगीत के बीच से हट जाऊँ। यह जो इन्स्ट्रूमेंटल आज यहाँ बज रहा है वह वाल्ट्स संगीत है और हमारी श्रीमति जी के एक्स्क्लूज़िव स्पेनिश कलेक्शन में से है। नाचा न सही सुना तो जा ही सकता है।




शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2008

मन कुन्तो मौला

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नुसरत साहब ने परंपरागत सूफ़ी गायकी से निकलकर इस विधा को जिस तरह से आमजन से जोड़ा, वह बेमिसाल था। वे पिछली सदी के चंद बेहद ज़रूरी और प्रभावी कलाकारों में से एक थे। उनका असमय जाना बेहद दुखद था। यदि वे जीवित होते तो हमारे पास कुछ और अच्छा संगीत होता।
उनके जो गीत, कव्वालियां आदि आमतौर पर सुनाई पड़ते हैं उन्होनें उसके इतर भी बहुत कुछ काम किया है।
उनकी कुछ उत्कृष्ट रचनाओं पर नुपुर सीडीज़ ने एक लंबी चौड़ी सीरीज़ निकाली थी। उसी में से एक कव्वाली यहां आज प्रस्तुत है।
मन कुन्तो मौला।

बुधवार, 1 अक्तूबर 2008

प्रकृति-पुत्र की प्रेम-अभिव्यक्ति

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लगता है दो दिन पहले सुनाए जागर को सुनकर यहाँ आने वाले लोग डर गए थे। सिवाय मीत भाई के कोई भी अपनी हाज़री नहीं लगा गया। इसलिय सोचा आज कुछ हटकर और ऐसा लगाया जाए जिसमें मास की रुचि हो।
कन्ट्री म्युज़िक ने एल्विस प्रेस्लि और गार्थ ब्रुक्स से होते हुए लंबे रास्ते तय किये हैं। संदर्भों से परे जब गीत समझ नहीं आते तो भी वे बरबस अपनी ओर खींच लेते हैं। अमरिकी जीवन में झांकने का एक माध्यम कन्ट्री म्युज़िक भी है और अगर ऐसा है तो मुझे लगता है "प्रकृति-पुत्र" जॉन डेनवर के गीतों को भुलाया नहीं जा सकता।
प्रेम पर हज़ारों गीत/कविताएं लिखे-गाए गए हैं मगर अभिव्यक्ति का चरम जैसा डेनवर के गीत "ऐनी'स सांग" में दिखता है वैसा असर अकसर कहीं दिखाई नहीं पड़ता। अपनी पत्नी ऐनी के लिये डेनवर ने यह गीत 1974 में लिखा और गाया था। यदि आप जानना चाहते हैं डेनवर ऐनी से कितना प्यार करते थे तो यह गाना सुन लीजिये, आपको अंदाज़ा हो जाएगा। वैसे इस प्रेम-गीत की प्रसिद्धि का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यह गीत अमेरिका में हर शादी-ब्याह के मौके पर बजता था।



सोमवार, 29 सितंबर 2008

देवताओं का आह्वाहन और लोकगीत - जागर

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जागर के बारे में मैं कुछ कहूँ इसकी ज़रूरत नहीं। आज एक ऐसे ब्लोग पर पहुँचा जहां जागर के सम्बंध में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है। फिर भी इतना तो ज़रूर बताऊँगा कि यह गायन की ऐसी विधा है जिसके द्वारा देवताओं का आह्वाहन किया जाता है और उनसे अपनी समस्याओं का निदान करवाया जाता है।
यह जागर मैनें पिछले हफ़्ते ही अपने दूसरे ब्लोग पर लगाया था। यहाँ इसे लगाने के दो कारण हैं: एक तो विविध प्रकार के संगीत का साझा करने के उद्देश्य से यह ब्लोग बनाया गया है इसलिए कायदे से मुझे यहीं जागर भी पोस्ट करना चाहिये और दूसरा वे सभी लोग जो इस ब्लोग पर नियमित आते हैं ज़रूरी नहीं कि मेरे दूसरे ब्लोग पर भी जाते हों।
खैर। सुनिये यह जागर।



गुरुवार, 18 सितंबर 2008

महफ़िल सजी है सुख़नगोई की मलिका पुख़राज के संग

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यूँ समझ लीजिये कि महफ़िल उरूज पर है और एक ओर सुख़नगो बैठे हैं, दूसरी ओर सुख़नफ़हम। इस ओर बैठी हैं मलिका पुख़राज। बात छिड़ी है ग़ालिब की। मलिका ने सुर साधे ही हैं और कह रही हैं ग़ालिब की ये ग़ज़ल:



जहां तेरा नक़्शे-क़दम देखते हैं
ख़ियाबां-ख़ियाबां इरम देखते हैं
दिल-आशुफ़्तगा ख़ाले-कुंजे-दहन हैं
सुवैदा में सैर-अदम देखते हैं
तेरे सर्वे-क़ामत से इक क़द्दे-आदम
क़यामत के फ़ित्ने को कम देखते हैं
तमाशा कर ऐ महवे-आईनादारी
तुझे किस तमन्ना से हम देखते हैं
सुराग़े-तुफ़े-नाला ले दाग़े-दिल से
कि शब-रौ का नक़्शे-क़दम देखते हैं
बनाकर फ़क़ीरों का हम भेस 'ग़ालिब'
तमाशा-ए-अहले-करम देखते हैं।

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

एक आवाज़ स्टूडियो से बाहर और स्टूडियो के अंदर

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एक आवाज़ जो इस देश के हज़ारों-हज़ार लोगों का स्वर बनी, एक स्वर जो अवसाद में, उल्लास में, यों कहें कि रोज़मर्रा के हर मूड में बतौर आदर्श लोगों के मानस में छाया रहा। अपने भीरु व्यक्तित्व की सतहों के नीचे छिपे नायक को कल्पना में जब भी लोगों ने सुरों में नहलाया, तो यही स्वर उनके ज़ेहन में अपने-आप, बग़ैर किसी प्रयास के उभरा।
मो. रफ़ी साहब ने जो चित्र अपनी गायकी से सजाए, वे कभी नहीं मिटने वाले। वह संयमित आवाज़ बचपन में भी मेरे लिये उत्सुकता का विषय थी। सोचता था, जिसकी आवाज़ ऐसी होगी वह दिखता कैसा होगा। जब देखा तो लगा यह तो कोई साधारण सा इंसान है, यह भगवानों की आवाज़ इसकी कैसे हो सकती है?
फिर कुछ समय बाद बी बी सी के लिये 1977 में किया गया उनका इंटरव्यु जब सुना तो कई दिनों तक विश्वास नहीं हुआ कि अपनी तानों से लोगों के अंतस गुंजायमान कर देने वाली इस आवाज़ के पीछे कितना साधारण, कितना मितभाषी और दुनियावी छलावों और पेंचों से दूर रहने वाला कैसा आमजन में घुल जाने वाला व्यक्तित्व छुपा हुआ है। सुनकर देखिये क्या यह वही आवाज़ है जो मुग़ल-ए-आज़म में हाई नोट्स पर यह गीत गा रही है?

पहले इन्टरव्यु:





अब यह गीत:




जिन्होनें ऐसे गीत रच डाले, उनके लिये क्या कहा जाए? शब्द तो छोटे पड़ जाएंगे। (इसलिये सिर्फ़ उनकी तस्वीरें देकर उन्हें याद कर रहा हूँ।)

रविवार, 14 सितंबर 2008

भुला दिया गया एक गीत

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ट्रैफ़िक पर लिखी दूसरी किस्त पर पाठक न मिलने की फ़्रस्टेशन में डूबते-उबरते हुए मैनें संगीत के अपने गोदाम में टटोलना शुरु किया तो फ़िल्मी संगीत के स्वर्णिम युग से ठीक पहले के दौर के गीतों पर नज़र गई।
यह वह युग था जो पारसी थियेटर की सपाट गायकी के प्रभाव से बाहर आकर अपनी पगड़ंडी खोद रहा था और गिरते-पड़ते अपनी दिशा तलाश रहा था। एक ओर पंकज मल्लिक, अनिल बिस्वास, आर सी बोराल, के सी डे आदि संगीत की नई परिभाषाएं गढ़ रहे थे तो दूसरी ओर नौशाद, जी एम दुर्रानी, सज्जाद हुसैन, एस डी बर्मन इत्यादि राजकुमारी, अमीरबाई कर्नाटकी, हुस्न बानो, गीता राय, कानन देवी, तलत और रफ़ी आदि के साथ नये आयाम तलाश रहे थे। ये सभी लोग कोशिश कर रहे थे कि फ़िल्मी संगीत शास्त्रीयता से परिपक्व हो और मैलोडी और हार्मनी में पगा भी हो।
यह जो गीत मैं आज लाया हूँ, उन गीतों में से जान पड़ता है, जिन्होनें निश्चित तौर पर रफ़ीमय स्वर्णिम युग के लिये एक परिपाटी तय की। 1946 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म "1857" में संगीत दिया था सज्जाद हुसैन ने और यह गीत अंजुम पीलीभीती ने लिखा था। गायकों की पहचान मैं नहीं कर सका। शुरु में रिकार्डिंग खराब है और कुछ हल्का भी सुनाई देता है। मगर मैं तो ट्रैफ़िक वाली पोस्ट पर लोगों के न जुटने से त्रस्त हूँ न तो इस ओर ध्यान नहीं दे रहा, आप भी मत दीजिये।

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

सिद्धेश्वर दा के हुक्म पर गोपालबाबू

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आज गोपालबाबू फिर गा रहे हैं ज़रा छोटे ही अंतराल पर। इसके पीछे सिद्धेश्वर भाई का हाथ है। इस गीत का थीम भी विरह ही है और इसमें स्त्री घुघूती से गुहार कर रही है आम की डाल पर बैठकर न गाने के लिये क्योंकि उसकी घुर-घुर सुनकर स्त्री को अपने पति की बेतरह याद हो आती है जोकि सीमा पर युद्ध पर गया हुआ है। साथ ही ये दो कविताएँ (पहले का कवि मुझे ज्ञात नहीं और दूसरी बच्चन जी की है) भी बोनस में:



आओ कोई बहाना ढूँढें, जश्न मना लें आज की शाम
या फिर लिख दें इन लम्हों के सूरज-चाँद तुम्हारे नाम

कोई हंसता सा लड़का प्यार कहीं करता होगा
गहरे प्यार की उजली शामों का अमृत पीता होगा
बेमंज़िल जो चल सकते हैं उनके नाम उठाएँ जाम
या फिर लिख दें इन लम्हों के सूरज-चाँद तुम्हारे नाम

अगले साल इसी लम्हा हम जाने कैसे हाल में हों
कौन भुला दे, कौन पुकारे, किन शहरों के जाल में हों
ये सब जुगनु उड़ जाएंगे, पेड़ पे लिख लो इनके नाम
आओ कोई बहाना ढूँढें, जश्न मना लें आज की शाम

*************

प्यार के पल में जलन भी तो मधुर है।

जानता हूँ दूर है नगरी पिया की
पर परीक्षा एक दिन होनी हिया की
प्यार के पल की थकन भी तो मधुर है।

आग ने मानी न बाधा शैल वन की
गल रही भुजपाश में दीवार तन की
प्यार के दर पर दहन भी तो मधुर है।

तृप्ति क्या होगी अधर के रस कणों से
खींच लो तुम प्राण ही इन चुंबनों से
प्यार के क्षण में मरण भी तो मधुर है।
प्यार के पल में जलन भी तो मधुर है।

बुधवार, 10 सितंबर 2008

मोहे सुहागन कीनी रे

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किसी-किसी के लेखन में अमरत्व का गुण इस कदर होता है कि भुलाए नहीं भूलता। सलीके से हिन्दी के पहले कवि अमीर खुसरो का लिखा कितने बरसों से गाने वालों के लिये इंस्पिरेशन रहा है। अब इस गीत को ही लीजिये। बचपन में जब वो फ़िल्मी गीत सुना था तो उसका मुखड़ा समझ में ही नहीं आया मगर बड़ा कर्णप्रिय लगा।

मेरा मानना है कि गीत अगर अर्थपूर्ण हो तो किसी भी संगीतकार के लिये उसे साध पाना आसान हो जाता है। "छाप तिलक सब छीनी रे" ऐसी ही एक रचना है। कितने ही वर्ज़न सुनाई पड़ते हैं इसके और हर एक एक से बढ़कर एक। अब इसी को लीजिये। मेहनाज़ के बारे में मैं नहीं जानता मगर उन्होनें यह गीत इतना बढ़िया गाया गया है कि एकदम बांध लेता है:


सोमवार, 8 सितंबर 2008

मलिका पुखराज की बातें और फ़साने

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ग़ज़ल की बात हो और मलिका पुखराज की बात न हो तो बात अधूरी लगती है। राजेश की मेहरबानी से मलिका पुखराज को सुनने का मौका मिला था और पहली ही बार में "अभी तो मैं जवान हूँ" ज़बान पर चढ़ गया। मलिका की पुरकशिश आवाज़ जो दिमाग पर छाई तो फिर नहीं उतरी।

लंबे अरसे से नहीं सुना था। सोचा आप लोगों के बहाने मैं भी सुन लूँ। मलिका जैसा गाने वाला हो तो कुछ चुन पाना खुद एक चुनौती होता है कि क्या छोड़ें और क्या सुनें। इसलिए जिस पहली ग़ज़ल पर नज़र गई, वही सुना रहा हूँ। कभी महाराजा हरि सिंह के यहाँ दरबारी गायिका रही मलिका की यह ग़ज़ल बहुत पुरानी जान पड़ती है; कितनी पुरानी ये तो मैं भी नहीं जानता।




वो बातें तेरी वो फ़साने तेरे
शगुफ़्ता शगुफ़्ता बहाने तेरे

बस एक ज़ख़्म नज़्ज़ारा हिस्सा मेरा
बहारें तेरी आशियाने तेरे

बस एक दाग़-ए-सज्दा मेरी क़ायनात
जबीनें तेरी आस्ताने तेरे

ज़मीर-ए-सदफ़ में किरन का मुक़ाम
अनोखे अनोखे ठिकाने तेरे

फ़कीरों का जमघट घड़ी दो घड़ी
शराबें तेरी बादाख़ाने तेरे

बहार-ओ-ख़िज़ां निगाहों के वहम
बुरे या भले सब ज़माने तेरे

‘अदम’ भी है तेरा हिकायत कदाह
कहाँ तक गए हैं फ़साने तेरे

शनिवार, 6 सितंबर 2008

राइनहार्ड मे की बच्चों से बातचीत

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राइनहार्ड मे जर्मनी के प्रतिष्ठित गायक हैं जिन्होनें अपने गीतों के द्वारा लगभग हर विषय को आवाज़ दी है। वे अपने गीत खुद लिखते हैं और उनके गीतों में पर्याप्त काव्योचित गुण होते हैं।
जर्मनी, जहाँ पर बालीवुड और शाहरुख खान अपनी सशक्त पहचान बना चुके हैं वहाँ राइनहार्ड का अपनी खास आडियंस है। 1967 से लेकर आजतक वे लगभग हर दो साल में एक एलबम रिलीज़ करते रहे हैं। बरसों से शाकाहारी राइनहार्ड PETA के सदस्य हैं और उन्होनें इस विषय पर भी गाने लिखे और गाए हैं।
यह गीत Du bist ein Riese Max! बेहद काव्यात्मक अभिव्यक्ति और खूबसूरत संगीत के कारण मुझे बेहद पसंद है। मैं राइनहार्ड का एक दूसरा ही गीत आज पोस्ट करना चाहता था मगर मैनें देखा है कि जिस भाषा को लोग समझ नहीं सकते उसके गीतों को सुनने के लिये मेरे पोस्ट्स पर ज़्यादा लोग भी नहीं जुटते। यह निराशाजनक है मगर सच है। इसी वजह से मैनें इस गीत को, जोकि काफ़ी catchy है, आज पोस्ट करने का इरादा किया। गीत के बोलों के साथ मैनें उसका भावानुवाद भी नीचे लिख डाला है। आप खुद ही एक गीतकार के रूप में राइनहार्ड की कल्पनाशक्ति देख सकते हैं। यह गीत मैक्स नाम के एक प्रतीकात्मक बच्चे को संबोधित है। बाकी आप गीत पढ़कर समझ ही लेंगे।
Kinder werden als Riesen geboren,
Doch mit jedem Tag, der dann erwacht,
Geht ein Stück von ihrer Kraft verloren,
Tun wir etwas, das sie kleiner macht.
Kinder versetzen so lange Berge,
Bis der Teufelskreis beginnt,
Bis sie wie wir erwachs‘ne Zwerge
Endlich so klein wie wir Großen sind!
Du bist ein Riese, Max! Sollst immer einer sein!
Großes Herz und großer Mut und nur zur Tarnung nach außen klein.
Du bist ein Riese, Max! Mit deiner Fantasie,
Auf deinen Flügeln aus Gedanken kriegen sie dich nie!
Freiheit ist für dich durch nichts ersetzbar,
Widerspruch ist dein kostbarstes Gut.
Liebe macht dich unverletzbar
Wie ein Bad in Drachenblut.
Doch paß auf, die Freigeistfresser lauern
Eifersüchtig im Vorurteilsmief,
Ziehen Gräben und erdenken Mauern
Und Schubladen, wie Verliese so tief.
Du bist ein Riese, Max! Sollst immer einer sein!
Großes Herz und großer Mut und nur zur Tarnung nach außen klein.
Du bist ein Riese, Max! Mit deiner Fantasie,
Auf deinen Flügeln aus Gedanken kriegen sie dich nie!
Keine Übermacht könnte dich beugen,
Keinen Zwang wüßt‘ ich, der dich einzäunt.
Besiegen kann dich keiner, nur überzeugen.
Max, ich wäre gern dein Freund,
Wenn du morgen auf deinen Reisen
Siehst, wo die blaue Blume wächst,
Und vielleicht den Stein der Weisen
Und das versunkene Atlantis entdeckst!
Du bist ein Riese, Max! Sollst immer einer sein!
Großes Herz und großer Mut und nur zur Tarnung nach außen klein.
Du bist ein Riese, Max! Mit deiner Fantasie,
Auf deinen Flügeln aus Gedanken kriegen sie dich nie!





बच्चे बहुत कुछ लेकर पैदा होते हैं
उसके बाद हर दिन के साथ
खोता जाता है उनकी शक्ति का कुछ हिस्सा
हम सिखाते हैं उन्हें कुछ ऐसा जो कर जाता है उन्हें छोटा
बच्चे पहाड़ खिसकाते हैं
शैतानी खेल शुरु होने से पहले
पर अंतत: वे हम बड़ों जितने छोटे हो जाते हैं।

तुम बहुत बड़े हो, मैक्स! हमेशा ऐसे ही रहना
दिल बड़ा और खूब हिम्मत, बस छलावे के लिये छोटे दिखते हो
अपनी कल्पनाशक्ति के साथ तुम बहुत बड़े हो मैक्स!
तुम्हारे विचारों के डैने तुम्हें कभी अपने से अलग नहीं करेंगे।

तुम्हारी आज़ादी की जगह कुछ और नहीं ले सकता
विरोध तुम्हारी अनन्य शक्ति है
प्रेम तुम्हे पवित्र बनाता है
जैसे तेज़ाब में किया गया स्नान
मगर सम्हल कर रहना कि घात में हैं शिकारी
जो कब्र खोदते हैं और खड़ी करते हैं दीवारें
और अंधेरे गहरे कोने गढ़ते हैं

तुम बहुत बड़े हो, मैक्स! हमेशा ऐसे ही रहना
दिल बड़ा और खूब हिम्मत, बस छलावे के लिये छोटे दिखते हो
अपनी कल्पनाशक्ति के साथ तुम बहुत बड़े हो मैक्स!
तुम्हारे विचारों के डैने तुम्हें कभी अपने से अलग नहीं करेंगे।

कोई ताकत तुमको डिगा नहीं सकती
मैं नहीं जानता कोई विवशता जो तुम्हें बांध सके
कोई हरा नहीं सकता, सिर्फ़ यकीन जीत सकता है
मैं तुम्हारा दोस्त बनना चाहूँगा
कल जब तुम अपनी यात्रा पर निकलोगे
तुम देखोगे वे जगहें जहाँ नीले फूल खिलते हैं
और शायद पारस पत्थर
और खोजोगे डूबे हुए समंदर

तुम बहुत बड़े हो, मैक्स! हमेशा ऐसे ही रहना
दिल बड़ा और खूब हिम्मत, बस छलावे के लिये छोटे दिखते हो
अपनी कल्पनाशक्ति के साथ तुम बहुत बड़े हो मैक्स!
तुम्हारे विचारों के डैने तुम्हें कभी अपने से अलग नहीं करेंगे।

गुरुवार, 4 सितंबर 2008

गोपाल बाबू गोस्वामी गा रहे हैं कुमाऊँनी गीत

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(नीचे की लाल रंग की बकवाद को आप चाहें तो स्किप कर सकते हैं और अगर चाहें तो सीधे गीत बजाना भी शुरु कर सकते हैं)
पहाड़ भूत की तरह मुझसे चिपके हैं हालांकि 14-15 सालों से सलीके से जाना बंद कर चुका हूँ या शायद जा नहीं पा रहा हूँ। मैं उस बेचारी पीढ़ी से हूँ जिनकी जड़ें पहाड़ों से जुड़ी हैं और जीवन शहरों से इसलिये मैं न तो पहाड़ी रह गया हूँ और न ठीक तरह से शहरी ही बन पाया हूँ।
बचपन में पिताजी टू-इन-वन में पहाड़ी-गढवाली गाने बजाया करते थे तो बहुत चिढ़ होती थी। जब अपने मन का करने की उम्र हुई तो वो सारी कैसेट्स उठाकर संदूक में डाल दीं। बंगलौर आने के बाद पहाड़ जाने के सारे अवसर बंद हो गए तो उन पहाड़ी गीतों की याद आने लगी।
गोपाल बाबू गोस्वामी के गीत खोजने शुरु किये। अभी तक ज़्यादा का जुगाड़ नहीं हो पाया है। खैर। अगर आसान शब्दों में समझना चाहें तो गोपाल बाबू गोस्वामी को आप कुमाऊँ-गढवाल के मोहम्मद रफ़ी समझ सकते हैं। उनके गीत कुमाऊँनी चेतना का हिस्सा बन चुके हैं और लोग उनके गाए गीतों को अकसर कुमाऊँ के लोकगीत ही समझ लेते हैं। उनका गाया "बेड़ु पाको बारो मासा" (जिसका संगीत प्रसिद्ध कलाकार मोहन उप्रेती ने तैयार किया था) कुमाऊँ रेजिमेंट की धुन के रूप में अपनाया गया।
पिताजी बताते हैं कि उत्तरैणी के कौतिक (मेला) में जब वे गाते हुए चलते थे तो हज़ारों लोग उनके पीछे-पीछे गाते चलते थे। इस तथ्य की तस्दीक़ इरफ़ान भाई ने अशोक जी के द्वारा अपनी घुरू%20घुरू%20उज्याव%20है%20गो">एक पोस्ट में भी की है।
बहरहाल सुनें यह गीत। मनीआर्डर अर्थव्यवस्था वाले उत्तराखण्ड में अकसर पति शहरों में या फ़ौज में नौकरी करते हैं और पीछे छोड़ जाते हैं अपना परिवार। विवाह होने पर पत्नी भी गांव में ही छूट जाती है। विरह-दग्ध इन स्त्रियों की मूक पीड़ा को अक्सर पहाड़ी गीतों में स्वर दिया जाता रहा है। गोपाल बाबू ने भी इस विषय पर गीत गाए हैं। यह गीत उसका एक उत्कृष्ट नमूना है। नीचे मैनें गीत के बोल लिख दिये हैं मगर आलस्य और समयाभाव के कारण अनुवाद नहीं कर रहा। मेरी कुमाऊँनी हास्यास्पद पाई जाती है और इस बोली में मेरा हाथ भीषण रूप से तंग है। नीचे लिखे गीत में अनिवार्य रूप से कुछ गलतियाँ होंगी। दोनो ही बातों के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ।



कैले बजै मुरली हो बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूँ मा
चिरी है कलेजी मेरी तू देख मन मा

मुरुली क सोर सुणी हिया भरी ऐगो
को पापी ल मेरो बैणा मन दुखै हैछो
स्वामी परदेसा मेरा उ जरीं लाम मा
कैले बजै मुरली हो बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूँ मा

मेर मैथ की भगवती तू दैणी हजैये
कुशल मंगल म्यारा स्वामी घर लैये
नंगरा निसाड़ा ल्यूँलो देबी मैं तेरा थान मा
कैले बजै मुरली हो बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूँ मा

भूमि का भूमिया देबा धर दिया लाज
पंचनामा देबो तुम सुणी लिया धात
गवै की चरेउ मेरी तुमरी छ हाथ
दगड़ रैया देबो स्वामी का साथ मा
कैले बजै मुरली हो बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूँ मा

मंगलवार, 2 सितंबर 2008

अरुण दाते की सहज गायकी

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कुछ और पोस्ट करना था, कुछ और कर रहा हूँ। इसका कारण छोटे मियां हैं जिनको गहरी नींद से उठाने के लिये मुझे तरह-तरह के गीत बजाने पड़े। उसी प्रक्रिया में इस गीत पर नज़र गई जो एक अरसे से मैंने नहीं सुना था।
कुछ दो-एक साल पहले आफ़िस में मेरे डेस्क पर अरुण दाते (Arun Date) की एक सीडी पड़ी थी। मेरे एक कर्नाटकी सहकर्मी ने वह सीडी उठाई और बोला, "ये अरुण डेट कौन है?" आप हँस सकते हैं मगर मुझे दुख हुआ। ऐसी है हमारी अनभिज्ञता। दुनिया के दूसरे छोर पर बैठे जार्ज माइकल के समलैंगिक सम्बंध तो हमारे अखबारों की सुर्खियां बन जाते हैं मगर अपने ही प्रादेशिक कलाकार हमारे लिए लगभग अनजान रहते हैं।
अरुण दाते मराठी कला जगत में बहुत बड़े हस्ताक्षर हैं। उनके गाए कुछ गीत और भावगीतों को सुनने का अवसर मुझे मिला है। अपने गायन से वे एक सहज संसार बुनते हैं जो उसी सहजता से सुनने वालों तक प्रेषित भी होता है। उनको सुनना, उनसे संवाद करने जैसा लगता है और आपको महसूस होगा कि आप एक हद तक उनके व्यक्तित्व को समझ भी पा रहे हैं।
इस गीत में उनका साथ लता जी ने दिया है। गीत गंगाधर महांबरे का है और संगीत प. हृदयनाथ मंगेशकर ने दिया है। अफ़सोस मेरे पास इस गीत का अनुवाद नहीं है। सभी मराठी भाषी भाईयों-बहनों से गुज़ारिश है यहां मेरी मदद करने की। गीत मैंने नीचे दे दिया है।
संधीकाली या अशा, धुंदल्या दिशा दिशा,
चांद येइ अंबरी चांदराती रम्य या,
संगती सखी प्रिया, प्रीत होइ बावरी
मुग्ध तू नि मुग्ध मी, अबोल गोड संभ्रमी, एकरूप संगमी
रातराणीच्यामुळे, श्वास धुंद परिमळे, फुलत प्रीतिची फुले
प्रणयगीत हे असे, कानि ऐकू येतसे, गीती शब्द ना जरी
सांजरंगी रंगुनी, न कळताच दंगुनी, हृदयतार छेडुनी
युगुलगीत गाउनी, एकरूप हो‍उनी, देउ प्रीत दावुनी
प्रणायचित्र हे दिसे, रंगसंगती ठसे, कुंचला नसे जरी

रविवार, 31 अगस्त 2008

ललितलवंगलतापरिशीलनकोमलमलयसमीरे। मधुकरनिकरकरम्बितकोकिलकूजितकुञ्ज कुटीरे॥

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आपने आनंदमठ तो ज़रूर पढ़ा होगा? नहीं पढ़ा? तो शायद फ़िल्म देखी होगी? कम से कम वंदे मातरम् तो ज़रूर पढ़ा-सुना होगा। मुझे दोनों ही सौभाग्य प्राप्त हुए हैं। यहां संगीत की बात होती है इसलिये उपन्यास को अभी भूल जाते हैं और ज़रा इस उपन्यास पर बनी फ़िल्म और इस फ़िल्म के एक गाने की ओर मुखातिब होते हैं।
1952 में बनी इस फ़िल्म में लता और हेमंतदा का गाया वंदे मातरम् आज भी उतना ही ओजपूर्ण है जितना उस समय था। हैरान होता हूँ कि गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर इस गाने को बजाने की सुध किसी को क्यों नहीं रहती। खैर, इसे भी जाने दीजिये।
हेमेन गुप्ता की इस फ़िल्म में संगीत हेमंत कुमार ने दिया था। हेमंतदा ने वैसे बहुत ही गिनी चुनी फ़िल्मों के लिये संगीत दिया और गाया। इस मामले में वे बहुत चूज़ी थे। शायद इसीलिये उनका संगीत हमेशा एक समान प्रभाव छोड़ पाता था। इस फ़िल्म से लेकर 1969 में आई अनुपमा इसके सबूत हैं।
महाकवि जयदेव की गीत-गोविंद एक अनुकरणीय काव्य-रचना रही है। (राधा-कृष्ण की अवधारणा का स्रोत बहुत हद तक यही काव्य है)। आश्चर्य नहीं यदि यह रचना फ़िल्मों को भी प्रभावित कर पाई। मगर इस रचना के किसी भी अंश पर गीत बनाना सचमुच ही चुनौतीपूर्ण रहा होगा; हालांकि यह भी याद रखने योग्य तथ्य है कि संपूर्ण गीत-गोविंद में अष्टपदी गीत हैं जिनके लिये राग और ताल के निर्देश भी कवि द्वारा व्याख्यायित हैं; तो भी आधुनिक विधा फ़िल्मी-गीत थोड़ी सहज किस्म की विधा है, इसलिये ऐसी कठिन रचना के साथ न्याय कर पाना कठिन ही रहा होगा।
यहां हेमंतदा ने एक खूबसूरत प्रयोग गीता दत्त की आवाज़ के साथ किया है। गीता दत्त प्रत्येक पद की आखिरी पंक्तियां पार्श्व में गाती हैं जो धीरे-धीरे उठते हुए मुख्य स्वर बन जाता है। गीता दत्त जी की आवाज़ भक्ति रस से वैसे भी सराबोर ही लगती है।
हेमंतदा ने गीत-गोविंद के प्रारंभ में से वंदना का एक अंश गीत के लिये उठाया है। पूरा गीत-गोविंद ही इतना गेय है कि संस्कृत होने के बावजूद आप इसे आराम से सस्वर गा सकते हैं। मुझे पढ़ते-पढ़ते ही कुछेक अष्टपदियाँ याद हो गईं (मतलब समझ न आए वो बात और है)। नीचे लिखे दे रहा हूँ कोशिश कीजिये। इस वंदना में भगवान विष्णु के दस अवतारों की स्तुति की गई है (जिसमें एक भगवान बुद्ध भी हैं और कल्कि भी)। मगर इस गीत में कुछ ही रूपों को लिया गया है। जो गीत का हिस्सा हैं उन्हें बोल्ड कर रहा हूँ जिससे फ़ालो करने में आपको कठिनाई न हो।




हरे मुरारे! मधुकैटभारे! गोपाल, गोविंद मुकुंद प्यारे!

प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदम्
विहितवहित्रचरित्रमखेदम्
केशव धृतमीनशरीर
जय जगदीश हरे।

क्षितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे
धरणिधरणकिण्चक्रगरिष्ठे।
केशवधृतकच्छप रूप।
जय जगदीश हरे।

वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना
शशिनि कलंककलेव निमग्ना।
केशव! धृतसूकररूप
जय जगदीश हरे।

तव करकमलवरे नखमद् भुतश्रंगम्
दलितहिरणयकशिपुतनुभृंगम्।
केशव! धृतनरहरिरूप
जय जगदीश हरे।

छलयसि विक्रमणे बलिमद् भुतवामन
पदनखनीरजनितजनपावन।
केशव! धृत वामनरूप
जय जगदीश हरे।


क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापम्
स्नपयसि पयसि शमित भवतापम्।
केशव! धृतभृगुपतिरूप
जय जगदीश हरे।

वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयम्
दशमुखमौलिबलिं रमणीयम्।
केशव! धृतरामशरीर
जय जगदीश हरे।


वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम्
हलहतिभीतिमिलितयमुनाभम्।
केशव! धृतहलधररूप
जय जगदीश हरे।

निन्दसि यज्ञविधेरहहश्रुतिजातम्
सदयहृदयदर्शितपशुघातम्।
केशव! धृतबुद्धशरीर
जय जगदीश हरे।


म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालम्।
धूमकेतुमिव किमपि करालम्।
केशव! धृतकल्किशरीर
जय जगदीश हरे।


श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम्
श्रृणु सुखदं शुभमं भवसारम्।
केशव! धृतदशविधरूप
जय जगदीश हरे।

शनिवार, 30 अगस्त 2008

फ़िर बेग़म अख़्तर की बारिश

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दो दिन पहले बेग़म अख़्तर की ग़ज़ल पर संजय भाई ने कहा कि उनका मालवा बारिश को तरस रहा है और कि ग़ज़ल सुनकर "मन तक बरस गए… आसमां में रुके बादल"। संजय भाई ने कहा तो नज़रअंदाज़ कैसे कर सकते हैं। सोचा क्यों न उनके मालवा को एक सावन का गीत अख़्तरीबाई की आवाज़ में सुना दूँ। शायद उमस कम हो जाए, शायद मन तर हो जाए।
जिस तरह बेग़म सावन से टूटकर गुहार लगा रही हैं वह कैसे न रह जाए? जब बड़े भाई शास्त्रीय संगीत सीख रहे थे एक किस्सा सुनाते थे कि एक बार बड़े ग़ुलाम अली खां समन्दर किनारे बैठकर गा रहे थे और उनकी तानों पर पानी उनके पैताने तक चढ़ आया था। क्या जाने संगीत देवों की वाणी हो।
साथ ही त्रिलोचन और मुक्तिबोध की क्रमश: दो कविताएँ, जो सांस्कृतिक गलियारों में सालों पहले मुफ़्त के दिनों में दोस्तों के साथ बांचा करते थे, मेरी मनमर्ज़ी की।





॥1॥
आओ इस आम के तले
यहाँ घास पर बैठें हम
जी चाही बात कुछ चले
कोई भी और कहीं से
बातों के टुकड़े जोड़ें
संझा की बेला है यह
चुन-चुनकर तिनके तोड़ें
चिन्ताओं के। समय फले।
आधा आकाश सामने
क्षितिज से यहाँ तक आभा
नारंगी की। सभी बने।
ऐसे ही दिन सहज ढले।

॥2॥
… यह सही है कि चिलचिला रहे फ़ासले,
तेज़ दुपहर भूरी
सब ओर गरम धार-सा रेंगता चला
काल बाँका-तिरछा;
पर, हाथ तुम्हारे में जब भी मित्र का हाथ
फैलेगी बरगद-छाँह वहीं
गहरी-गहरी सपनीली-सी
जिसमें खुलकर सामने दिखेगी उरस्-स्पृशा
स्वर्गीय उषा
लाखों आँखों से, गहरी अन्त:करण तृषा
तुमको निहारती बैठेगी
आत्मीय और इतनी प्रसन्न,
मानव के प्रति, मानव के
जी की पुकार
जितनी अनन्य।

गुरुवार, 28 अगस्त 2008

मलिका-ए-ग़ज़ल अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी

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अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी, जो बेग़म अख़्तर के नाम से ज़्यादा जानी जाती हैं, को ग़ज़लों में शास्त्रीय संगीत के सफलतापूर्वक प्रयोग करने का श्रेय जाता है। बरसों पहले जब ग़ज़लों को समझने-बूझने की कोशिशें चल रही थीं तो बेग़म अख़्तर की एक कैसेट सोतड़ू (राजेश) के पास से हाथ लगी। एक बार सुनने के बाद ही सिर भन्ना गया कि अमां ये क्या बला है। सिर-पैर कुछ समझ नहीं आया और अगले कुछ सालों तक दोबारा सुनने का इत्तेफ़ाक भी नहीं हुआ। अगले मौके पर जब सुना तो दंग रह गया (तबतक शायद समझ थोड़ी बेहतर हो गयी होगी)।
मलिका-ए-ग़ज़ल अकसर अपनी ग़ज़लें खुद ही कंपोज़ करती थीं। (वैसे मैंने नोटिस किया था कि मलिका पुख़राज ने भी अपनी कुछ बेहतरीन ग़ज़लें खुद ही कंपोज़ की थीं)। शायद अंतिम समय में बेग़म अख़्तर ने सुदर्शन फ़ाकिर की काफ़ी ग़ज़लें गाईं थीं। जितनी भी मैंने सुनीं मुझे सभी बेहद पसंद हैं; खासकर "कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया" और "ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया"। अफ़सोस कि mp3 में फ़िलहाल मेरे पास इनमें से कोई भी ग़ज़ल उपलब्द्ध नहीं है मगर जो है वह भी उतनी ही बेहतरीन है।


सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं
लेकिन इस तर्क-ए-मुहब्बत का भरोसा भी नहीं
यूँ तो हंगामे उठाते नहीं दीवान-ए-इश्क
मगर ऐ दोस्त कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं
मुद्दतें गुजरीं तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं
मुँह से हम अपने बुरा तो नहीं कहते कि फिराक़
है तेरा दोस्त मगर आदमी अच्छा भी नहीं
ग़ज़ल के बाकी के शेर यहां:
ये भी सच है कि मोहब्बत में नहीं मैं मजबूर
ये भी सच है कि तेरा हुश्न कुछ ऐसा भी नहीं
दिल की गिनती न यगानों में न बेगानों में
लेकिन इस जल्वागाह-ए-नाज से उठता भी नहीं
बदगुमां होके न मिल ऐ दोस्त जो मिलना है तुझे
ये झिझकते हुए मिलना कोई मिलना भी नहीं
मेहरबानी को मोहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त
आह मुझसे तो मेरी रंजिश-ऐ-बेजा भी नहीं
बात ये है कि सुकून-ए-दिल-ए-वहशी का मकाम
कुंज-ए-जिन्दा भी नहीं बौशाते सेहरा भी नहीं
सौदा - पागलपन, इश्क, तर्क-ए-मुहब्बत - प्रेमांत, यगान - अज़ीज़

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

बारिश के बीच गंगूबाई हंगल

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बरसात आती है तो मुझे दो गीत याद आते हैं। एक तो मुन्नी बेग़म का गाया "जब सावन रुत की पवन चली…" और खासतौर पर बेग़म अख़्तर की गाई ग़ज़ल "कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया…" बेहद याद आती है; खासकर वो शेर:
"हम तो समझे थे के बरसात में बरसेगी शराब,
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया"

मैं शराब के लिये बरसात का मुंह नहीं ताकता। समझदारी करके स्टाक रखता हूँ। अंग्रेज़ों के लिये भारत की बारिश कुत्ते-बिल्ली बरसने जैसी होती है मगर अपने लिये तो सावन-भादो नवजीवन का प्रतीक है, एक पर्व है। सिर्फ़ झूले पड़ने का पर्व नहीं, संगीत का पर्व भी जहां सुर और साज़ बारिश की ताल पर थिरकते हैं और बारिश के लिये भी राग निर्धारित हैं। कल झमाझम बरसा है और आज भी आसार हैं। बंगलौर में तो अभी नवंबर तक मानसून रहेगा। ऐसे में अगर मिया की मल्हार सुना जाए तो मज़ा दुगना हो जाए और अगर गंगूबाई हंगल गा रही हों तो मज़े का अनुपात कई गुना बढ़ जाता है। कल से ही बालकनी में बैठकर यही कर रहा हूँ। छोटी सी तान है फ़िलहाल के लिये।

रविवार, 24 अगस्त 2008

पंडित भीमसेन जोशी की आवाज़ में एक भजन

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आज भजन पेश करने के पीछे यह औचित्य नहीं कि मैं चार दिन पहले ही पिता बना हूँ (और इसीलिये ग़ायब भी था) इसलिये भक्ति-भावना से भरकर ऐसा कर रहा होऊँ, यह भी नहीं कि मैं भक्त किस्म का प्राणी होऊँ।
कारण मात्र इतना है कि पंडित भीमसेन जोशी का यह मराठी भजन मुझे काफ़ी अपीलिंग लगा और लंबे अरसे से इसे सुनता आ रहा हूँ (बग़ैर समझे)। एक मराठी सहकर्मी से जब अर्थ की बाबत पूछा तो उसका जवाब और भी ज़्यादा उलझाने वाला था। उसके अनुसार इसमें श्रीराम के वनवास के बारे में कहा गया है। "क्या कहा गया है?" मैंने पूछा तो उसका जवाब था, "उनके वनवास के बारे में।"
"अरे वनवास के बारे में बताया जा रहा है।" उसने कहा।
मैंने पूछा, "वही तो। क्या बताया जा रहा है?"
"वनवास के बारे में।" उसके जवाब में कोई फेरबदल नहीं हुआ तो मुझे लगा पूछना व्यर्थ है। मतलब तो मुझे आज भी नहीं मालूम।
किस राग पर आधारित है या बंदिश कौनसी है इसका भी मैं पता नहीं लगा पाया। सच तो यह है कि जब पहली बार सुना था तो पता ही नहीं था कि भजन है मगर बंध गया था सुनकर। इसलिये मैं अपने को परे सरकाकर भजन को आगे कर देता हूँ। बस इतना और कि भजन समर्थ रामदास का है और संगीत राम फाटक का।



आरंभी वंदीन अयोध्येचा राजा ।
भक्ताचीया काजा पावत असे ॥१॥

पावत असे महासंकटी निर्वाणी ।
रामनाम वाणी उच्चारीत ॥२॥

उच्चारिता राम होय पाप चर ।
पुण्याचा निश्चय पुण्यभूमी ॥३॥

पुण्यभूमी पुण्यवंतासीं आठवे ।
पापीयानाठवे काही केल्या ॥४॥

काही केल्या तुझे मन पालटेना ।
दास म्हणे जन सावधान ॥५॥

सोमवार, 18 अगस्त 2008

दूसरे-तीसरे दशक के कॉमेडियन हार्मोनिस्ट्स

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कॉमेडियन हार्मोनिस्ट्स जर्मनी का दूसरे-तीसरे दशक का मशहूर ग्रुप रहा है, इतना मशहूर कि आप उनका शुमार पिछली सदी के सबसे सफ़ल म्यूज़िक ग्रुप्स में कर सकते हैं। मगर साथ ही यह भी सच है कि नाज़ियों के उत्थान के बाद लगभग 1934 के आसपास इस ग्रुप को ज़बर्दस्ती ख़त्म कर दिया गया और इसके बाद धीरे-धीरे लोग उनके बारे में भूलते गए। 1975 में एबेनहार्ड फ़ेश्नर द्वारा इस ग्रुप पर डॉक्युमेंटरी बनाए जाने तक यह ग्रुप लोगों के मानस पटल से उतरा ही रहा।
1997 में इस ग्रुप पर एक बेहतरीन फ़िल्म बनाई गई जिससे मुझे इस ग्रुप के बारे में पहली बार पता चला। मुझे इसे देखने का मौका तीन साल बाद मिला। मज़े की बात यह है कि फ़िल्म में ग्रुप के गाए गानों का ही प्रयोग किया गया है, उनकी रिकार्डिंग दोबारा नहीं की गई। फ़िल्म जर्मन में है मगर अमेरिका में भी लांच की गई थी और अन्य भाषाओं में भी डब की गई थी। यह ग्रुप अपने सफलता के दिनों में अमेरिका के लिये जाना पहचाना नाम था। छ: लोगों के इस ग्रुप ने अमेरिका में अपने कई प्रोग्राम किये थे और हॉलीवुड की कुछ फ़िल्मों में काम भी किया था। इन छ: लोगों में से तीन यहूदी थे और यही वजह थी कि नाज़ी ताकतों ने इस ग्रुप पर धीरे-धीरे पूर्णरूप से पाबंदी लगा दी थी जिसके बाद ग्रुप के यहूदी सदस्य देश छोड़ने को मजबूर हो गए थे।
छ: लोगों का मिलकर चला जादू अलग होने के बाद कभी दोबारा नहीं चला। अलग अलग तरह की गायन शैली और सुरों से जो वितान ये छ: लोग पैदा करते थे शायद वह एक की भी कमी पर नहीं बन पाया होगा। कारण जो भी रहे हों मगर सच यह है कि यह ग्रुप अद्भुत गीत गाता था और अर्थपूर्ण तो उस दौर के गीत होते ही थे।
नीचे गीत मैंने जर्मन में लिख छोड़ा है और साथ ही अपना मनचाहा अनुवाद भी। 





Irgendwo auf der Welt gibt's ein kleines bißchen Glück
und ich träum davon in jedem Augenblick.
Irgendwo auf der Welt gibt's ein bißchen Seligkeit
und ich träum davon schon lange, lange Zeit.
Wenn ich wüßt, wo das ist, ging ich in die Welt hinein,
denn ich möcht' einmal recht so von Herzen glücklich sein.

Irgendwo auf der Welt fängt mein Weg zum Himmel an,
irgendwo, irgendwie, irgendwann.
Ich hab' so Sehnsucht. Ich träum so oft:
Einst wird das Glück mir nah sein.
Ich hab' so Sehnsucht. Ich hab' gehofft:
Bald wird die Stunde nah sein.
Tage und Nächte wart' ich darauf.
Ich geb' die Hoffnung niemals auf.

Irgendwo auf der Welt gibt's ein kleines bißchen Glück
und ich träum davon in jedem Augenblick.
Irgendwo auf der Welt gibt's ein bißchen Seligkeit
und ich träum davon schon lange, lange Zeit.
Wenn ich wüßt wo das ist, ging ich in die Welt hinein,
denn ich möcht' einmal recht so von Herzen glücklich sein.
Irgendwo auf der Welt fängt mein Weg zum Himmel an,
irgendwo, irgendwie, irgendwann.
कहीं थोड़ी सी खुशी है
मैं अपलक उसके सपने देखता हूँ
किसी हिस्से में थोड़ा सा आनंद
मैं बरसों से उसे ढूंढ रहा हूँ
पता हो तो मैं वहां जाऊँ
कि मैं एक बार तहेदिल से खुश होना चाहता हूँ

दुनिया के किसी कोने से मेरे स्वर्ग का रास्ता फूटेगा
कहीं, कैसे न कैसे, कभी न कभी
चाह है मुझे, अक्सर सपना देखता हूँ
एक बार कामयाबी मिलेगी मुझे
इतना लालायित हूँ, उम्मीद है मुझे
वह घड़ी जल्द ही आएगी
दिन-रात इन्तज़ार करता हूँ मैं
और उम्मीद कभी नहीं छोड़ता

कहीं थोड़ी सी खुशी है
मैं अपलक उसके सपने देखता हूँ
किसी हिस्से में थोड़ा सा आनंद
मैं बरसों से उसे ढूंढ रहा हूँ
पता हो तो मैं वहां जाऊँ
कि मैं एक बार तहेदिल से खुश होना चाहता हूँ
दुनिया के किसी कोने से मेरे स्वर्ग का रास्ता फूटेगा
कहीं, कैसे न कैसे, कभी न कभी

शनिवार, 16 अगस्त 2008

तलत का करिश्मा

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तलत साहब उन चुनिंदा गायकों में से हैं जो एक खास वर्ग की पसंद हैं और जो लोग उन्हें सुनते हैं वे अकसर तलत को बाकी गायकों पर तरजीह देते हैं। मेरे पसंदीदा गायक हालांकि रफ़ी साहब हैं मगर तलत जी के गीत मैं किसी भी वक़्त सुन सकता हूँ। कालेज के दौर में मैं तलत का इतना दीवाना था कि दोस्तों के लिये तलत नाम मेरा पर्याय बन गया था। मेरे जन्मदिन पर दोस्तों ने तलत के डयुएट्स का चार कैसेट्स का सेट भेंट किया था…
उनकी आवाज़ मखमली कही जाती है और अनिल बिस्वास से लेकर न जाने कितने लोगों के संस्मरण मैं उनके बारे में पढ़ चुका हूँ, सुन चुका हूँ। जिस पिच पर वह गाते थे उसपर तो लोगों की आवाज़ ही बंद हो जाती है।
इसीलिये मुझे हमेशा लगता रहा कि तलत ख़ास तरह के गाने ही गा सकते थे। यह भ्रम उस दिन टूटा जब एक दिन अचानक यू-ट्यूब पर रफ़ी का गाया मशहूर गाना "चल उड़ जा रे पंछी…" तलत की आवाज़ में सुना। यह गीत हाई-पिच पर गाया गया है और इसमें पर्याप्त वाइस-मौड्युलेशन है।दोनों चीज़ें एक साथ साध पाना रफ़ी जैसे चंद गिने-चुने गायकों के लिये ही संभव रहा है। तलत की क्षमता पर शक़ तो नहीं था मगर हाँ लगता था रफ़ी के कई गीत रफ़ी के अलावा उस दौर और इस दौर का कोई गायक नहीं गा सकता था। यह भ्रम कुछ हद तक ही सही, इस गाने को सुनने के बाद टूटा है।
आप भी सुनिये तलत का करिश्मा।

गुरुवार, 14 अगस्त 2008

नाना मौस्कौरि और दुनिया के गीत

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दोस्तो,
यह गीत (There's a time, there's a time) मैनें आखरी बार करीब 10 साल पहले सुना था। सुना क्या था, एफ़ एम के सुनहरे दिनों में देर रात को रिकार्ड कर लिया था, मगर अपनी बेवकूफ़ी की वजह से खो भी दिया था। तब से लेकर आजतक लगातार इस गीत को ढूंढता रहा। यह भी नहीं मालूम था कि किसने गाया है। खैर इंटरनेट के दौर में यह कोई मुश्किल काम नहीं। मगर गीत मिलना फ़िर भी कठिन है।


नाना मौस्कौरि ग्रीस की मशहूर गायिका रही हैं, ऐसी गायिका जिन्होनें अपना ज़्यादातर काम अपने देश से बाहर किया है और योरोप की तकरीबन हर प्रमुख भाषा में गाया है। 1958 से लेकर 2007 तक वे संगीत के क्षेत्र में बनी रही हैं। वोकल कॉर्ड में खराबी इस गायिका के लिये वरदान साबित हुई है, जिसे आप उनकी आवाज़ में पहचान सकते हैं। यह ख़ामी उनकी आवाज़ को करिश्माई रूप से और भी कर्णप्रिय बनाती है।

उनका गाया यह गाना एल्विस प्रेस्लि के एक गाने की तर्ज पर है हालांकि मुझे नहीं मालूम कि पहले कौनसा गाना गाया गया था। वैसे गाने दोनों ही अद्भुत हैं। एल्विस का गीत भी भविष्य में पोस्ट किया जाएगा।
कई साल पहले जर्मनी में ग्रीस के बारे में एक डॉक्युमेंटरी बनी थी जिसके लिये नाना ने एक गीत गाया था, “White Roses from Athens”। मुझे यह गीत भी पसंद है। इसके अलावा नाना के जर्मन में गाए कुछ गीत भी मुझे बेहद पसंद हैं। आने वाले दिनों में उनके कुछ और गीत मैं यहां पोस्ट करूंगा, यदि उपलब्ध हो सके तो।
वैसे हिंट के लिये बता दूँ कि अगली पोस्ट एक मराठी भजन होगा जोकि पंडित भीमसेन जोशी ने गाया है।
एक अनुरोध: गीत को इअरफ़ोन या हैडफ़ोन लगाकर सुनें। बैकग्राउण्ड में बजने वाला संगीत गायक की आवाज़ से धीमा है इसलिये ठीक से सुनाई नहीं देता और उसके बगैर गाने का लुत्फ़ भी नहीं आएगा।




There's a time, there's a time,
Time for summer and for snow,
Time for love to grow,
And to end in lonely tears

There's a place I adore
That I fear I'll see no more
I will see no more
Though I live for a hundred years

There's a time for losing all you want
And a time for traveling on
But the hurt in my heart,
It goes on from day to day,
Will not go away,
Keeps on longing for what's gone

There's a time, there's a time
When a love is young and new
Heaven's painted blue
When we lay in the summer grass

For a time, for a time,
You were so in love with me
So, how was I to see
That the summer would pass?

Now, you ride the ocean, chase the stars
Underneath some far-away sky
And the hurt in my heart
Knows you're never coming home,
Never coming home
Till the day the sea runs dry

In my dreams, in my dreams,
You have left yourself behind
You caress my mind
When the nights grow dark and chill

Vagabond, vagabond
Always traveling beyond,
Where's the magic wand
That will bring you nearer still?

There's a time for holding to your dreams
And a time for starting a new
But the hurt in my heart,
It goes on from day to day,
Never goes away
For it's all I have left of you.

शनिवार, 9 अगस्त 2008

चीख और हुल्लड़ के बीच संगीत

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संगीत पर दिमाग देना भी उतना ही ज़रूरी है जितना कान देना। काफ़ी दिनों से सिर्फ़ गाने, ग़ज़लें ही पोस्ट किये जा रहा था और संगीत पर कुछ विचार जो मैनें काफ़ी अरसे से सहेज कर रखे हुए थे, उनको पोस्ट करना स्थगित किये जा रहा था।
विनोद भारद्वाज कुछ अरसे तक नवभारत टाइम्स में विभिन्न विषयों पर छोटे-छोटे मगर काफ़ी विचारोत्तेजक लेख लिखते रहे। आज पढ़ते हैं संगीत के बदलते स्वरूप पर उनके तात्कालिक विचार। यह छोटा सा आलेख बारह साल पहले मार्च 1996 में छपा था मगर इसकी प्रासंगिकता आज बढ गई है।

एक प्रसिद्ध पश्चिमी मानवशास्त्री ने कहीं कहा था कि एक समाज शायद चित्रकला के बिना रह सकता है लेकिन संगीत के बिना रहना उसके लिये असंभव है। वैसे तो प्रागैतिहासिक गुफा चित्र यह बात अच्छी तरह से बताते हैं कि आदिम मनुष्य भी रचना को अपने लिये जरूरी मानता था पर शायद संगीत एक अधिक केंद्रीय और जरूरी अभिव्यक्ति है। वैसे अगर हम 'केंद्रीय विधा' सरीखी बहसों में न उलझें (एक जमानें में हिंदी आलोचक इस पर बहस करते थे कि कविता केंद्रीय विधा है या कहानी), तो भी संगीत के पक्ष में कुछ महत्वपूर्ण बातें की जा सकती हैं। पश्चिम के एक अध्ययन में एक दिलचस्प तथ्य सामने आया था कि मोत्सार्ट का संगीत सुनकर व्यक्ति अधिक बुद्धिमान और 'सभ्य' हो जाता है। शायद इस बात का मतलब यह नहीं है कि आप ज्यों ही मोत्सार्ट सुनना शुरू करेंगे त्यों ही आपकी आई क्यू बढ़ जाएगी पर इस तथ्य से कौन इनकार करेगा कि संगीत हर तरह के आदमियों की मानसिकता को उद्वेलित करता है, उसे बेहतर बनाता है। कुमार गंधर्व या भीमसेन जोशी को सुनकर श्रोता निश्चय ही एक बुद्धिमान और बेहतर इंसान बनता है। इस तरह का श्रेष्ठ संगीत श्रोता रुलाता भी है और उसे आम ज़िंदगी से ऊपर भी ले आता है। अच्छा संगीत सिर्फ़ मनोरंजन ही नहीं है - विचार भी है। मीठा और सजावटी संगीत चित्त को प्रसन्न करता है। पर जिस संगीत में विचार भी हो वह मानसिकता को प्रसन्नता से भी परे ले जाता है। मिसाल के लिये जब मैं किशोरी अमोनकर का गाया राग भूप सुनता हूँ तो लगता है कि जैसे गायिका आपको विचार भी दे रही है। शायद इसीलिये कहा गया है कि श्रेष्ठ संगीत बुद्धिमान बनाता है।

एक हिंदी कवि ने अपनी कविता में कहा था कि सड़क पर साधारण काम करने वाला मकैनिक अगर हजारा सिंह का गिटार सुन कर बहुत प्रसन्न और मगन है, तो इस संगीत-अनुभव को भीमसेन जोशी सुनने वाले तथाकथित श्रेष्ठ श्रोताओं के अनुभव से खराब क्यों माना जाए? इस सवाल में एक तरह की सच्चाई है। साधारण जन का संगीत से प्रेम विशिष्ट श्रोताओं से कम नहीं है। दरअसल विशिष्ट श्रोताओं की भी एक महान नकली दुनिया है। सिर्फ़ संगीत की दुनिया में ही नहीं कला, सिनेमा, साहित्य आदि की दुनिया में भी फ़ैशनेबल और हाइब्रो होने का नकली दिखावा सामने आता रहा है।

अंग्रेज़ी कवि टी एस एलियट की एक प्रसिद्ध कविता में कहा गया है कि प्रदर्शनी में 'स्त्रियां आ जा रही हैं और मिकेलांजेलो के बारे में बतिया रही हैं।' यहां कवि फ़ैशनेबल कला रसिकों पर चोट कर रहा है- स्त्रियों पर नहीं। धनी और फ़ैशनेबल वर्ग की पार्टियों में हुसैन, गणेश पाइन या रविशंकर की बात कर के लोग अपने को उम्दा टेस्ट रखने वाला साबित करते हैं। लेकिन इस तरह के फ़ैशनेबल लोग सच्चे और गंभीर किस्म के कला रसिकों की दुनियां निरर्थक नहीं बना देते हैं।

हाल में एक फ़्रांस के अध्ययन के बारे में पढ़ा था कि पश्चिम की युवा पीढ़ी भयंकर रुप में तेज़ाबी और शोर से भरे संगीत को सुन कर बहरी हो रही है। किशोर वाकमैन या डिस्कमैन पर जो शोर से भरा संगीत सुन रहे हैं वह उनके कान के पर्दों पर सीधा प्रहार कर रहा है। महान जर्मन संगीतकार लुडविग फ़ान बिथोवन अपने अंतिम वर्षों में बहरे हो गए थे। उनके बारे में कहा जाता है कि उनकी कालजयी रचना नवीं सिंफ़नी का पहला कार्यक्रम समाप्त हुआ था, तो वह श्रोताओं की प्रशंसा में बजायी गई तालियों के शोर को भी सुनने लायक नहीं रह गए थे। लेकिन बिथोवन दूसरे कारणों से बहरे हुए थे। आज के युवा श्रोता अगर तथाकथित 'हैडबैंगर' (सरतोडू) संगीत को सुन कर अपने कान के परदे भी फोड़ने के लिये तैयार हैं तो यह एक अलग तरह की समस्या है। इसका सम्बन्ध पश्चिम की अत्यधिक यंत्रविधि पर आश्रित और उपभोक्तावाद की कैदी हो चुकी सभ्यता से भी है। वहां का युवा वर्ग विलाल्दी या मोत्सार्ट के कर्णप्रिय संगीत से आसानी से अपने आप को जोड़ नहीं पाता है। एक तेज़ाबी और शोर से भरी हुई नशीली दवाओं की दुनिया में आत्मघाती ढंग से खोई हुई संवेदना उसे अपनी लगती है।

पश्चिम के सबसे लोकप्रिय संगीत चैनल एम टी वी अपने विज्ञापनों में यह बात गर्व से कहता है कि 'हम अच्छे टेस्ट के कारण नहीं पहचाने जाते हैं।' यानी अच्छा, संतुलित कर्णप्रिय, विचारशील संगीत आप ही को मुबारक हो-हम तो सरतोड़ू संगीत के रसिया हैं। इस तरह का संगीत गैर पश्चिमी देशों में भी लोकप्रिय हुआ है।

एक ज़माने के सोवियत संघ की लौह दीवार भी पॉप संगीत से बच नहीं सकी थी। चेकोस्लोवाकिया आदि देशों में युवा वर्ग सत्ता से अपना विरोध दिखाने के लिये भी पॉप संगीत की शरण में चला जाता था। वहां बाकयदा अंडरग्राउंड संगीत में पॉप संगीत का मिजाज़ एक अलग तरह की 'डिसिडेंट' मानसिकता से जुड़ा था।

दरअसल एम टी वी का विज्ञापन जब 'गुड टेस्ट' पर सीधा हमला करना चाहता है, तो उसका एक अर्थ व्यवस्था से विरोध ज़ाहिर करने में भी है। पश्चिमी उपभोक्ता समाज के ऊबे हुए किशोर साठ के दशक में जब 'ट्यून इन, टर्न ऑन, ड्राप आउट,' के आकर्षक नारों से चमत्कृत हुए थे, तो वे एक साइकेडेलिक दुनिया में चले गए। लड़ने के इरादे से नहीं, बल्कि वे यथार्थ से भागना चाहते थे। नशीली दवाओं, तेज़ संगीत ने उन्हें एक अंधेरे बंद कमरे से दूसरे बंद कमरे में जाने की राह दिखाई। साठ के दशक में बीटल्स का संगीत उस दौर में एक तरह का प्रोटेस्ट नज़र आता था। पर आज के तेज़ाबी, तामसी और 'राक्षसी' हैवी मैटल संगीत के सामने अब बीटल्स के गाने कर्णप्रिय और अर्थपूर्ण दिखाई देने लगे हैं।

बीटल्स
गायकों ने पंडित रविशंकर के सितारे और महर्षि महेश योगी के मेडीटेशन में भी दिलचस्पी ली थी। दिलचस्प बात यह है कि आज पंडित रविशंकर एम टी वी की आलोचना कर रहे हैं और दूसरे शास्त्रीय संगीतकार उन पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने ही सबसे पहले पॉप संगीत का गुरु बनने की कोशिश की थी। आज जब ध्वनि प्रदूषण पर भी ध्यान दिया जा रहा है तो 'चीख' और 'हुल्लड़' में फ़र्क करने की एक जेनुइन ज़रूरत भी नज़र आ रहा है।

- विनोद भारद्वाज

बुधवार, 6 अगस्त 2008

फ़रीदा ख़ानम और दयार-ए-दिल की रात

6टिप्पणियां
फ़रीदा ख़ानम से इन दिनों मैं कुछ ज़्यादा ही प्रभावित हूँ और इसकी वजहें भी हैं मेरे पास। जब से गीत-ग़ज़ल पोस्ट करनी शुरु की हैं तबसे यह फ़रीदा आपा की तीसरी पोस्ट है। यह सिलसिला आगे भी जारी रखने का विचार है। मेरा उद्देश्य है कि आप लोगों के साथ संगीत की हर शक्ल बाँटू। कम से कम वह सब जो मैं सुनता हूँ।
यह ग़ज़ल मैनें बहुत ध्यान से पहली बार तब सुनी जब इसे अपनी लिखी इस कहानी में इस्तेमाल किया। तभी यह भी पता लगा कि इसके भी तीन शेर तो गाए ही नहीं गए हैं। शायद गुलाम अली साहब ने भी यह ग़ज़ल गाई है मगर मैनें कभी सुनी नहीं है। खैर छोड़िये… फ़िलहाल आप इस ग़ज़ल का लुत्फ़ लीजिये।









दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक़्ल तो दिखा गया

वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब-ए-दुश्मनाँ हुई
वो छोटी-छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया

जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिये
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया

पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गईं वो सोहबतें
ज़मीं निगल गई उन्हें या आसमान खा गया

ये सुबहो की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
अब आईने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया

ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई
वो लहर किस तरफ़ गई ये मैं कहाँ चला गया

गए दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक
अमलकशो उठो कि आफ़ताब सर पे आ गया
 

प्रत्येक वाणी में महाकाव्य... © 2010

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