
Thursday, 29 October 2009
गुलाब के खिलने तक

Monday, 27 April 2009
बानू का जाना
जब मैंने उन्हें सुनना शुरू किया तबतक ख़राब तबीयत के चलते वे गाना बंद कर चुकी थीं और अंत तक उनका गाना लगभग बंद ही रहा मगर भला हो तकनीक का, कि उनके बाद भी हम और हमारे बच्चे ऐसे कलाकारों और उनकी रचनाओं से महरूम नहीं रहेंगे। इकबाल बानो को श्रद्धांजलि ग़ालिब की इस ग़ज़ल के साथ।
दिया है दिल अगर उस को, बशर है क्या कहिये
हुआ रक़ीब तो हो, नामाबर है क्या कहिये
ये ज़िद, कि आज न आवे और आये बिन न रहे
क़ज़ा से शिकवा हमें किस क़दर है क्या कहिये
रहे है यूँ गह-ओ-बेगह के कू-ए-दोस्त को अब
अगर न कहिये कि दुश्मन का घर है क्या कहिये
ज़िह-ए-करिश्मा के यूँ दे रखा है हमको फ़रेब
कि बिन कहे ही उन्हें सब ख़बर है क्या कहिये
समझ के करते हैं बाज़ार में वो पुर्सिश-ए-हाल
कि ये कहे कि सर-ए-रहगुज़र है क्या कहिये
तुम्हें नहीं है सर-ए-रिश्ता-ए-वफ़ा का ख़याल
हमारे हाथ में कुछ है, मगर है क्या कहिये
उन्हें सवाल पे ज़ओम-ए-जुनूँ है क्यूँ लड़िये
हमें जवाब से क़तअ-ए-नज़र है क्या कहिये
हसद सज़ा-ए-कमाल-ए-सुख़न है क्या कीजे
सितम, बहा-ए-मतअ-ए-हुनर है क्या कहिये
कहा है किसने कि "ग़ालिब" बुरा नहीं लेकिन
सिवाय इसके कि आशुफ़्तासर है क्या कहिये
Monday, 13 April 2009
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

Saturday, 4 April 2009
आए न बालम

Thursday, 19 March 2009
सुस्वरलक्ष्मी का आठवां सुर

कर्णाटक भक्ति संगीत श्रीमती जी को भी बेहद पसंद है और इसी के चलते घर पर तरह तरह का दक्षिण भारतीय भक्ति संगीत इक्कठा होता रहता है। इसलिए सोचा कि आज ब्लॉग पर सुब्बुलक्ष्मी के गायन को स्थान मिलना चाहिए।
Monday, 9 March 2009
ख़ुद तेरी लागली
डेढ़ महीने की इस ब्लॉग से छुट्टी के बाद आज अचानक ही मैदान में उतर आया। दरअसल काम की व्यस्तता और कमर का दर्द एक ही रफ़्तार से बढ़ते रहे और ठीक से कुछ भी नहीं हो पा रहा था। अब भी कोई अन्तर नहीं पड़ा है मगर लगा दोस्त कहीं नाराज़ न हो जाएँ। मैं तो पूरे महीने सिर्फ़ और सिर्फ़ शास्त्रीय संगीत ही सुनता रहा।
विरह गीतों की परम्परा में गोपाल बाबू के दो बहुत ही प्रसिद्ध और बहुत ही कर्णप्रिय कुमाउनी गीत यहाँ पहले लगाए थे। जो दर्जा गोपाल बाबू को कुमाऊं में प्राप्त है वैसा ही नरेन्द्र सिंह नेगी जी को गढ़वाल में है। केसेट से सीडी और सीडी से ऑनलाइन संगीत के कई दौर पार करके नरेंद्र सिंह जी आज भी नाच-गा रहे हैं। यह जो गीत नीचे है वह उनके करीयर का शुरुआती है।
गीत में बाँसुरी की पहली ही तान गीत के मूड को सेट कर देती है। इस गीत को सुनकर मुझे बचपन में गाँव में पिकनिक जैसे बिताये दिनों की गहराती और अंततः घुप्प होती शामें याद आ जाती हैं। उन शामों में टूटता मन और रोमांचित करता डर घुला होता था। गीत सुनते हुए अब भी सब कुछ वैसा ही लगता है।
Tuesday, 27 January 2009
"आबार हाबेतो देखा" मन्ना दे के स्वर

उस चर्चा में कुछ लोगों ने कहा कि मन्ना दे जी ने हिन्दी से बाहर बाक़ी भाषाओं में काफी गया है, खासकर बांग्ला में। तब मुझे लगा कि उनके गीत ढूँढने चाहिए। कुछ और ढूंढ़ना शुरू किया तो यह जानकर हैरत हुई कि उन्होंने मलयालम में भी काफी गीत गाए हैं और सबसे ज्यादा हैरत तब हुई जब पता लगा कि वे मुझसे ५-7 किलोमीटर भर की दूरी पर बंगलौर में ही रहते हैं. बाक़ी खोजबीन बाद में। फिलहाल इस खोज की खुशी में यह बांग्ला गीत मन्ना दे जी की आवाज़ में:
Friday, 16 January 2009
ख़ैर मिज़ाजे हुस्न की यारब
बेहद आसान से शब्दों में कैसे मानी भरे जाते हैं मलिका-ऐ-ग़ज़ल बेग़म अख़्तर से बेहतर कौन जानता होगा? जो कई बार सायास लगता है वह कितनी सहजता से बेग़म अख़्तर निभा लेती हैं इसका एक नमूना देखिये जिगर मुरादाबादी की इस अत्यन्त खूबसूरत ग़ज़ल में...
नीचे पूरी ग़ज़ल ही दे रहा हूँ। बेग़म अख़्तर ने ग़ज़ल के पाँच शेर गाए हैं।
कोई ये कह दे गुलशन गुलशन
लाख बलाएँ एक नशेमन।
कामिल रेहबर क़ातिल रेहज़न
दिल सा दोस्त न दिल सा दुश्मन।
फूल खिले हैं गुलशन गुलशन
लेकिन अपना अपना दामन।
उमरें बीतीं सदियाँ गुज़रीं
है वही अब तक अक़्ल का बचपन।
इश्क़ है प्यारे खेल नहीं है
इश्क़ है कारे शीशा ओ आहन।
ख़ैर मिज़ाजे हुस्न की यारब
तेज़ बहुत है दिल की धड़कन।
आज न जाने राज़ ये क्या है
हिज्र की रात और इतनी रोशन।
आ, के न जाने तुझ बिन कल से
रूह है लाशा, जिस्म है मदफ़न।
काँटों का भी हक़ है कुछ आख़िर
कौन छुड़ाए अपना दामन।
Tuesday, 13 January 2009
मेरी बओ सुरीला
यह गीत कहीं गहरे से उठता है हालाँकि जोशीला और समुदाय में गाया जाने वाला गीत है मगर किशन सिंह पवार की आवाज़ बहुत दूर ले जाती है। कई बार लगता है आप ख़ुद ही वहां कौतिक में लोगों के साथ नाच रहे हैं।पिताजी को जब ये गीत सुनाया तो बेहद खुश हुए। वे लंबे अरसे से इसे सुनना चाह रहे थे और तकरीबन बीस सालों से ये गीत हमारे घर से गायब था। धन्य हो इन्टरनेट-युग!
गाने की रिकार्डिंग थोड़ी ख़राब है मगर निश्चित ही सुने जाने लायक है।
PS: अभी पोस्ट करने के बाद दोबारा गीत को सुना तो लगा पहले वाला मेरा बयान शायद ग़लत है। गीत और किशन सिंह पंवार की आवाज़ जो दूरी मुझे तय करवाती है वह शायद मेरा व्हिम है और मेरी नितांत निजी कल्पना की वजह से ऐसा होता है। मगर यह तय है कि गाना सुनकर नाचने का जी करता है।
Saturday, 10 January 2009
ओरियंटल गीत का जादू
जैसे-जैसे पश्चिम से लोग आकर भारत में बसते गए, वैसे-वैसे यहाँ की संस्कृति में बहुत कुछ जुड़ता गया। संगीत को ही लें तो आज जो शास्त्रीय संगीत का या लोक संगीत का रूप है उसमें गंगा-जमुनी संस्कृति का अद्भुत सामंजस्य है। दूसरी ओर नौटंकियों और पारसी थियेटरों से निकलकर आई फिल्मों में संगीत हमेशा महत्वपूर्ण रहा और आज भी उसके बिना फिल्में दिखाई नहीं पड़तीं।
हर फ़िल्म के विषय और देशकाल को देखते हुए उसके लिए संगीत बुनना चुनौतीपूर्ण काम रहा होगा और हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर कहा जाए कि इसके लिए संगीतकारों ने दुनियाभर से खुराक प्राप्त की। अक्सर संगीतकारों पर "इधर की मिट्टी, उधर का रोड़ा" जोड़ने का आरोप लगता है। फिल्मी संगीत कई बार सीधा-सीधा किसी पश्चिमी या किसी भी बाहरी गीत या संगीत से प्रभावित होता है या उसकी नक़ल होता है। मगर जो अन्तर मुझे आज और बीते कल की नक़ल में आता है, वह आज उस नक़ल या "प्रभाव" के हिंदुस्तानीकरण का अभाव है।
अरबी-फ़ारसी संगीत का भी हमारी फिल्मों पर खासा प्रभाव पड़ा है और यह सिर्फ़ वहां प्रचलित वाद्ययंत्रों के प्रयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि कई बार कोई गीत वहां के संगीत की संतान लगता है। प्रभाव की बात करें तो ये पुराना ओरियंटल गीत उम कुल्तहुम की आवाज़ में सुनिए और बताइये कि इसका खूबसूरती से भारतीयकरण कहाँ हुआ...

यह खूबसूरत गीत गाने वाली उम कुल्तहुम ३१ दिसम्बर १९०४ को मिस्र में पैदा हुईं थीं। उन्हें द स्टार ऑफ़ द ईस्ट कहा जाता था। १९७४ में उनकी मृत्यु के बाद आज ३०-३५ सालों बाद भी उन्हें अरब जगत की सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध गायिका मना जाता है

