बुधवार, 3 दिसंबर 2008

नैहरवा

मुंबई में जो हुआ उससे दिल तो टूटा ही मगर उससे भी ज़्यादा तकलीफ़ अपने प्यारे नेताओं के ढंग देखकर हुई। मैं राजनीति से इस कदर दूर रहता हूँ कि उस बारे में पढ़ता तक नहीं हूँ, मगर इस मर्तबा पुलिस, एन एस जी और आतंकवादियों के बीच चल रही गोलाबारी के इतर जो देशभर में हमारे नेता गुल खिला रहे थे, उसने मुझे मजबूर किया कि मैं हर खबर पढ़ता रहा, यहां तक कि सिर्फ़ इसी बारे में बात करता रहा और दफ़्तर में काम के दबाव में नेट पर भी लगातार पढ़ता रहा।
ज़ाहिर है, लाखों लोगों ने यही किया और इससे उनकी तकलीफ़ बढ़ी ही। मगर इससे लोगों में एक जुड़ाव मुझे दिखा। इस सबसे जो बेचैनी बढ़ी उसे कम करने के लिये मैनें यूँहीं कैलाश खेर को सुनना शुरु किया और हैरान रह गया कि किस दरजे का गायक हमारे बीच मौजूद है। मैं आजकल का संगीत नहीं सुनता और सुनता भी हूँ तो वह मुझे अपील नहीं करता। मगर जब नैहरवा और कैलाश के गाए कुछ और गीत सुने तो मेरी चौंकने की बारी थी। इस दौरान मैं नैहरवा और वैसा ही कुछ कैलाश द्वारा गाया सुनता रहा। कबीर का लिखा है इसलिये बार बार लगता है कि इसका कोई छोर मुंबई जाकर ज़रूर लगता है। सुनकर देखिये, आपको भी राहत मिलेगी।


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2 टिप्पणियां:

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

महेन जी,
इन नेताओं में तो अब जंग लग चुका
अब खुद ही अपने भारत के लिए जंग लड़े हम।

Mired Mirage ने कहा…

बहुत सुन्दर ! बहुत ही मधुर !
घुघूती बासूती

 

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