सोमवार, 8 सितंबर 2008

मलिका पुखराज की बातें और फ़साने


ग़ज़ल की बात हो और मलिका पुखराज की बात न हो तो बात अधूरी लगती है। राजेश की मेहरबानी से मलिका पुखराज को सुनने का मौका मिला था और पहली ही बार में "अभी तो मैं जवान हूँ" ज़बान पर चढ़ गया। मलिका की पुरकशिश आवाज़ जो दिमाग पर छाई तो फिर नहीं उतरी।

लंबे अरसे से नहीं सुना था। सोचा आप लोगों के बहाने मैं भी सुन लूँ। मलिका जैसा गाने वाला हो तो कुछ चुन पाना खुद एक चुनौती होता है कि क्या छोड़ें और क्या सुनें। इसलिए जिस पहली ग़ज़ल पर नज़र गई, वही सुना रहा हूँ। कभी महाराजा हरि सिंह के यहाँ दरबारी गायिका रही मलिका की यह ग़ज़ल बहुत पुरानी जान पड़ती है; कितनी पुरानी ये तो मैं भी नहीं जानता।




वो बातें तेरी वो फ़साने तेरे
शगुफ़्ता शगुफ़्ता बहाने तेरे

बस एक ज़ख़्म नज़्ज़ारा हिस्सा मेरा
बहारें तेरी आशियाने तेरे

बस एक दाग़-ए-सज्दा मेरी क़ायनात
जबीनें तेरी आस्ताने तेरे

ज़मीर-ए-सदफ़ में किरन का मुक़ाम
अनोखे अनोखे ठिकाने तेरे

फ़कीरों का जमघट घड़ी दो घड़ी
शराबें तेरी बादाख़ाने तेरे

बहार-ओ-ख़िज़ां निगाहों के वहम
बुरे या भले सब ज़माने तेरे

‘अदम’ भी है तेरा हिकायत कदाह
कहाँ तक गए हैं फ़साने तेरे

4 टिप्पणियां:

मीत ने कहा…

अब आए हो गुरु पहाड़ के नीचे ... अब हो जाए एक जुगलबंदी मल्लिका पुखराज पे ------ Jokes apart !! मस्त कर दीन्हौं गुरु ... जियो !!!

Lavanyam - Antarman ने कहा…

लाजवाब हैँ ...
अल्फाज़ ऐसे
मानोँ दमकते हुए नगीने होँ...

Satyendra Prasad Srivastava ने कहा…

क्या बात है!

संजय पटेल ने कहा…

मलिका पुखराज की आवाज़ सुनने के बाद...

दिल पर वो तेरे जल्वों की बारिश
अब तो जीने की तमन्ना ही न रही.

 

प्रत्येक वाणी में महाकाव्य... © 2010

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