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गुरुवार, 18 सितंबर 2008

महफ़िल सजी है सुख़नगोई की मलिका पुख़राज के संग

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यूँ समझ लीजिये कि महफ़िल उरूज पर है और एक ओर सुख़नगो बैठे हैं, दूसरी ओर सुख़नफ़हम। इस ओर बैठी हैं मलिका पुख़राज। बात छिड़ी है ग़ालिब की। मलिका ने सुर साधे ही हैं और कह रही हैं ग़ालिब की ये ग़ज़ल:



जहां तेरा नक़्शे-क़दम देखते हैं
ख़ियाबां-ख़ियाबां इरम देखते हैं
दिल-आशुफ़्तगा ख़ाले-कुंजे-दहन हैं
सुवैदा में सैर-अदम देखते हैं
तेरे सर्वे-क़ामत से इक क़द्दे-आदम
क़यामत के फ़ित्ने को कम देखते हैं
तमाशा कर ऐ महवे-आईनादारी
तुझे किस तमन्ना से हम देखते हैं
सुराग़े-तुफ़े-नाला ले दाग़े-दिल से
कि शब-रौ का नक़्शे-क़दम देखते हैं
बनाकर फ़क़ीरों का हम भेस 'ग़ालिब'
तमाशा-ए-अहले-करम देखते हैं।

गुरुवार, 28 अगस्त 2008

मलिका-ए-ग़ज़ल अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी

8टिप्पणियां
अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी, जो बेग़म अख़्तर के नाम से ज़्यादा जानी जाती हैं, को ग़ज़लों में शास्त्रीय संगीत के सफलतापूर्वक प्रयोग करने का श्रेय जाता है। बरसों पहले जब ग़ज़लों को समझने-बूझने की कोशिशें चल रही थीं तो बेग़म अख़्तर की एक कैसेट सोतड़ू (राजेश) के पास से हाथ लगी। एक बार सुनने के बाद ही सिर भन्ना गया कि अमां ये क्या बला है। सिर-पैर कुछ समझ नहीं आया और अगले कुछ सालों तक दोबारा सुनने का इत्तेफ़ाक भी नहीं हुआ। अगले मौके पर जब सुना तो दंग रह गया (तबतक शायद समझ थोड़ी बेहतर हो गयी होगी)।
मलिका-ए-ग़ज़ल अकसर अपनी ग़ज़लें खुद ही कंपोज़ करती थीं। (वैसे मैंने नोटिस किया था कि मलिका पुख़राज ने भी अपनी कुछ बेहतरीन ग़ज़लें खुद ही कंपोज़ की थीं)। शायद अंतिम समय में बेग़म अख़्तर ने सुदर्शन फ़ाकिर की काफ़ी ग़ज़लें गाईं थीं। जितनी भी मैंने सुनीं मुझे सभी बेहद पसंद हैं; खासकर "कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया" और "ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया"। अफ़सोस कि mp3 में फ़िलहाल मेरे पास इनमें से कोई भी ग़ज़ल उपलब्द्ध नहीं है मगर जो है वह भी उतनी ही बेहतरीन है।


सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं
लेकिन इस तर्क-ए-मुहब्बत का भरोसा भी नहीं
यूँ तो हंगामे उठाते नहीं दीवान-ए-इश्क
मगर ऐ दोस्त कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं
मुद्दतें गुजरीं तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं
मुँह से हम अपने बुरा तो नहीं कहते कि फिराक़
है तेरा दोस्त मगर आदमी अच्छा भी नहीं
ग़ज़ल के बाकी के शेर यहां:
ये भी सच है कि मोहब्बत में नहीं मैं मजबूर
ये भी सच है कि तेरा हुश्न कुछ ऐसा भी नहीं
दिल की गिनती न यगानों में न बेगानों में
लेकिन इस जल्वागाह-ए-नाज से उठता भी नहीं
बदगुमां होके न मिल ऐ दोस्त जो मिलना है तुझे
ये झिझकते हुए मिलना कोई मिलना भी नहीं
मेहरबानी को मोहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त
आह मुझसे तो मेरी रंजिश-ऐ-बेजा भी नहीं
बात ये है कि सुकून-ए-दिल-ए-वहशी का मकाम
कुंज-ए-जिन्दा भी नहीं बौशाते सेहरा भी नहीं
सौदा - पागलपन, इश्क, तर्क-ए-मुहब्बत - प्रेमांत, यगान - अज़ीज़

बुधवार, 6 अगस्त 2008

फ़रीदा ख़ानम और दयार-ए-दिल की रात

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फ़रीदा ख़ानम से इन दिनों मैं कुछ ज़्यादा ही प्रभावित हूँ और इसकी वजहें भी हैं मेरे पास। जब से गीत-ग़ज़ल पोस्ट करनी शुरु की हैं तबसे यह फ़रीदा आपा की तीसरी पोस्ट है। यह सिलसिला आगे भी जारी रखने का विचार है। मेरा उद्देश्य है कि आप लोगों के साथ संगीत की हर शक्ल बाँटू। कम से कम वह सब जो मैं सुनता हूँ।
यह ग़ज़ल मैनें बहुत ध्यान से पहली बार तब सुनी जब इसे अपनी लिखी इस कहानी में इस्तेमाल किया। तभी यह भी पता लगा कि इसके भी तीन शेर तो गाए ही नहीं गए हैं। शायद गुलाम अली साहब ने भी यह ग़ज़ल गाई है मगर मैनें कभी सुनी नहीं है। खैर छोड़िये… फ़िलहाल आप इस ग़ज़ल का लुत्फ़ लीजिये।









दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक़्ल तो दिखा गया

वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब-ए-दुश्मनाँ हुई
वो छोटी-छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया

जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिये
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया

पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गईं वो सोहबतें
ज़मीं निगल गई उन्हें या आसमान खा गया

ये सुबहो की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
अब आईने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया

ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई
वो लहर किस तरफ़ गई ये मैं कहाँ चला गया

गए दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक
अमलकशो उठो कि आफ़ताब सर पे आ गया

शुक्रवार, 1 अगस्त 2008

फ़रीदा ख़ानम की एक और ग़ज़ल

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औरंगज़ेब के ख़िलाफ़ अपनी पहली पोस्ट में हमने आपको फ़रीदा आपा की अपनी एक प्रिय ग़ज़ल से रूबरू करवाया था। उसी मूड की एक ग़ज़ल लेकर हम फ़िर आ गए हैं। फ़ैज़ साहब की ग़ज़ल है, जिसमें से तीसरा शेर और मक़्ता ग़ायब है। दो मिसरों के बीच उसे पढ़ लें और पूरा लुत्फ़ लें। कुछ भाई लोग बोले थे कि मुश्किल शब्दों का अर्थ भी दे दिया जाए तो बेहतर। अब भई हमें जो शब्द कठिन लगे उनका मतलब हमनें दे दिया है। अगर फ़िर भी कुछ रह जाए तो माफ़ी चाहूँगा।






सब क़त्ल होके तेरे मुक़ाबिल से आये हैं
हम लोग सुर्ख-रू हैं कि मंजिल से आये हैं


शम्म-ए-नज़र, खयाल के अंजुम, जिगर के दाग़
जितने चिराग़ हैं तेरी महफ़िल से आये हैं


उठकर तो आ गये हैं तेरी बज़्म से मगर
कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आये हैं


हर इक क़दम अज़ल था, हर इक ग़ाम ज़िन्दगी
हम घूम-फिर के कूचा-ए-क़ातिल से आये हैं


इस बज़्म में शहीद-ए-वफ़ा जाने कौन हो
सब परसलाम हुस्न की महफ़िल से आए हैं


बादे-ख़िज़ां का शुक्र करो "फ़ैज़" जिसके हाथ
नामे किसी बहार-शमाइल से आये हैं


अंजुम-सितारे, ख़िज़ां-पतझड़, मुक़ाबिल-सामना, सुर्ख-रू-सफल, अज़ल-अनंतकाल, ग़ाम-गति, बादे-ख़िज़ां-पतझड़ के बाद,

अपने रफ़ी साहब नई तान के साथ

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परसों रफ़ी साहब की पुण्यतिथि थी और कल प्रेमचंद जी का जन्मदिन। अपन तो समंदर के बीच sailing कर रहे थे वरना वक़्त पर दोनों पर कुछ पोस्ट करते। प्रेमचंद जी मेरी कुव्वत से ज़्यादा गंभीर विषय हैं इसलिये देर से ही सही, सिर्फ़ रफ़ी जी पर पोस्ट डालकर फ़ारिग हो रहा हूँ।

रफ़ी साहब को आलोचकों ने ग़ज़ल के लिये अयोग्य कहकर ख़ारिज कर दिया था। संभवत: उन्हें सच में ऐसा लगा हो और यह भी संभव है कि वे इस बात से डरते हों कि रफ़ी साहब ग़ज़ल-जगत पर भी छा जाएंगे। सच जो भी हो, रफ़ी साहब ने ज़्यादा प्रयास नहीं किये इस ओर। तो भी उनकी गायी एक ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद है। वही प्रस्तुत है आज। शमीम जयपुरी जी की ग़ज़ल को ताज अहमद ख़ान जी ने संगीत दिया है।








कितनी राहत है दिल टूट जाने के बाद
ज़िंदगी से मिले मौत आने के बाद


लज़्ज़त-ए-सजदा-ए-संग-ए-दर क्या कहें
होश ही कब रहा सर झुकाने के बाद


क्या हुआ हर मसर्रत अगर छिन गई
आदमी बन गया ग़म उठाने के बाद


रात का माजरा किससे पूछूँ 'शमीम'
क्या बनी बज़्म पर मेरे आने के बाद

शनिवार, 26 जुलाई 2008

क्या आपने फ़रीदा ख़ानम की ग़ज़ल सुनी हैं?

9टिप्पणियां
ग़ज़ल-गायकी में चंद ही लोग ऐसे हैं जिन्होनें न सिर्फ़ अपने लिये जगह बनाई है बल्कि ग़ज़ल कहने की शैली को एक नया जामा भी पहनाया है। अगर मेहदी हसन इनमें सबसे आगे हैं तो फ़रीदा आपा उनसे ज़्यादा पीछे नहीं है। ब्लोगजगत में पिछले कुछ समय से लगातार काफ़ी अच्छी ग़ज़लें सुनने को मिल रही हैं मगर मुझे हैरानी होती रही है कि क्यों फ़रीदा ख़ानम या बेग़म अख़्तर की ग़ज़लें नहीं सुनाई पड़तीं। सोचा क्यों न यह काम मैं ही कर डालूँ। फ़रीदा आपा की मेरी निजी पसंदीदा ग़ज़ल आज मैं पोस्ट कर रहा हूँ। क़तील शिफ़ाई की ग़ज़ल को कलात्मकता के साथ-साथ जिस RAW अंदाज़ में फ़रीदा आपा ने गाया है, वैसा संयोजन मुझे काफ़ी कम ग़ज़लों मे देखने को मिला है। ग़ज़ल का मक़्ता गाया नहीं गया है तो भी मुझे लगा उसे छोड़ देना क़तील जी के साथ अन्याय होगा:


तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ
जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़साने कहाँ जाते

निकल कर दैर-ओ-काबा से अगर मिलता न मैख़ाना
तो ठुकराये हुए इंसाँ ख़ुदा जाने कहाँ जाते

तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादाख़ाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते

चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी
वगरना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते

"क़तील" अपना मुक़द्दर ग़म से बेगाना अगर होता
फिर तो अपने-पराये हमसे पहचाने कहाँ जाते


नीचे दो लिंक दिये गए हैं। पहला वाला लिंक अपेक्षाकृत सही तरह से काम करना चाहिये।

 

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