गुरुवार, 4 सितंबर 2008

गोपाल बाबू गोस्वामी गा रहे हैं कुमाऊँनी गीत

(नीचे की लाल रंग की बकवाद को आप चाहें तो स्किप कर सकते हैं और अगर चाहें तो सीधे गीत बजाना भी शुरु कर सकते हैं)
पहाड़ भूत की तरह मुझसे चिपके हैं हालांकि 14-15 सालों से सलीके से जाना बंद कर चुका हूँ या शायद जा नहीं पा रहा हूँ। मैं उस बेचारी पीढ़ी से हूँ जिनकी जड़ें पहाड़ों से जुड़ी हैं और जीवन शहरों से इसलिये मैं न तो पहाड़ी रह गया हूँ और न ठीक तरह से शहरी ही बन पाया हूँ।
बचपन में पिताजी टू-इन-वन में पहाड़ी-गढवाली गाने बजाया करते थे तो बहुत चिढ़ होती थी। जब अपने मन का करने की उम्र हुई तो वो सारी कैसेट्स उठाकर संदूक में डाल दीं। बंगलौर आने के बाद पहाड़ जाने के सारे अवसर बंद हो गए तो उन पहाड़ी गीतों की याद आने लगी।
गोपाल बाबू गोस्वामी के गीत खोजने शुरु किये। अभी तक ज़्यादा का जुगाड़ नहीं हो पाया है। खैर। अगर आसान शब्दों में समझना चाहें तो गोपाल बाबू गोस्वामी को आप कुमाऊँ-गढवाल के मोहम्मद रफ़ी समझ सकते हैं। उनके गीत कुमाऊँनी चेतना का हिस्सा बन चुके हैं और लोग उनके गाए गीतों को अकसर कुमाऊँ के लोकगीत ही समझ लेते हैं। उनका गाया "बेड़ु पाको बारो मासा" (जिसका संगीत प्रसिद्ध कलाकार मोहन उप्रेती ने तैयार किया था) कुमाऊँ रेजिमेंट की धुन के रूप में अपनाया गया।
पिताजी बताते हैं कि उत्तरैणी के कौतिक (मेला) में जब वे गाते हुए चलते थे तो हज़ारों लोग उनके पीछे-पीछे गाते चलते थे। इस तथ्य की तस्दीक़ इरफ़ान भाई ने अशोक जी के द्वारा अपनी घुरू%20घुरू%20उज्याव%20है%20गो">एक पोस्ट में भी की है।
बहरहाल सुनें यह गीत। मनीआर्डर अर्थव्यवस्था वाले उत्तराखण्ड में अकसर पति शहरों में या फ़ौज में नौकरी करते हैं और पीछे छोड़ जाते हैं अपना परिवार। विवाह होने पर पत्नी भी गांव में ही छूट जाती है। विरह-दग्ध इन स्त्रियों की मूक पीड़ा को अक्सर पहाड़ी गीतों में स्वर दिया जाता रहा है। गोपाल बाबू ने भी इस विषय पर गीत गाए हैं। यह गीत उसका एक उत्कृष्ट नमूना है। नीचे मैनें गीत के बोल लिख दिये हैं मगर आलस्य और समयाभाव के कारण अनुवाद नहीं कर रहा। मेरी कुमाऊँनी हास्यास्पद पाई जाती है और इस बोली में मेरा हाथ भीषण रूप से तंग है। नीचे लिखे गीत में अनिवार्य रूप से कुछ गलतियाँ होंगी। दोनो ही बातों के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ।



कैले बजै मुरली हो बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूँ मा
चिरी है कलेजी मेरी तू देख मन मा

मुरुली क सोर सुणी हिया भरी ऐगो
को पापी ल मेरो बैणा मन दुखै हैछो
स्वामी परदेसा मेरा उ जरीं लाम मा
कैले बजै मुरली हो बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूँ मा

मेर मैथ की भगवती तू दैणी हजैये
कुशल मंगल म्यारा स्वामी घर लैये
नंगरा निसाड़ा ल्यूँलो देबी मैं तेरा थान मा
कैले बजै मुरली हो बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूँ मा

भूमि का भूमिया देबा धर दिया लाज
पंचनामा देबो तुम सुणी लिया धात
गवै की चरेउ मेरी तुमरी छ हाथ
दगड़ रैया देबो स्वामी का साथ मा
कैले बजै मुरली हो बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूँ मा

8 टिप्पणियां:

sidheshwer ने कहा…

क्या सुनवा दिया महेन भाई सोते-सोते.
अब तो नींद में भी थपकियां देते रहेंगे पहाड़!

बहुत, बहुत, बहुत शुक्रिया!!!!!

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत मधुर-कर्णप्रिय...आभार सुनवाने का.

Tarun ने कहा…

सही कर रहे हैं महेन दाज्यू आप, पहाड़ छूट गया लेकिन ना इसकी यादें छुटती है ना इसका साथ, गोपाल बाबू गोस्वामी जी और नरेन्द्र सिंह नेगी जी के गाने सुन सुन कर ही हम बढ़े हुए। मैने भी इस गीत पर पोस्ट लिखी थी, जिसमें बालीवुड के गीत का मुखड़ा भी सुनाया था जिसमें कैले बाजे मुरली की धुन बजी थी। आप उसे यहाँ देख सकते हैं

मीत ने कहा…

लूट ले गए हो सुबह सुबह महेन भाई. शुक्रिया कहने का मैं आदी नहीं इस लिए नहीं कहूँगा. मैं सागर का, समुद्रों का गुलाम हूँ, पहाडो से ज्यादा नहीं मिला .... लेकिन क्या miss किया है इस का एह्साह है मुझे ..... मस्त कर दिया है आप ने महेन भाई .... शुक्रिया नहीं !!!

महेन ने कहा…

सिद्धेश्वर भाई, अगर नींद अच्छी आई हो तो एक और पहाड़ी गीत हो जाए?

तरुण भाई, इस लिंक पर गया था और मैं और श्रीमति जी चर्चा कर रहे थे कि मुखड़े में इस गीत का प्रभाव है या नहीं।

मीत भाई, शुक्रिया तो कहियेगा नहीं। मज़ा खराब हो जायेगा… मैं भी नहीं कहता कभी।

सोतड़ू ने कहा…

मुझे लगता है कि मोहम्मद रफ़ी के बजाय मुकेश कहना ठीक रहेगा। गोपाल बाबू की आवाज़ में मिठास है। गहराई और उतार-चढ़ाव के बजाय कर्णप्रिय ज़्यादा है, अक्सर यही ज़्यादा लोकप्रिय भी होता है। सीधा-सीधा, मीठा-मीठा (जगजीत की तरह)। अजय ढौंडियाल के मुताबिक (और मैंने सुना भी है)आवाज़ में दम हीरा सिंह राणा की है। हालांकि KT की राय उनके बारे में बहुत अच्छी नहीं है- कुछ लौंडेपन के गानों की वजह से, लेकिन मैं तो इसे कलाकार की जवानी का ही प्रतीक मानूंगा।

भूल-चूक लेणी देणी

महेन ने कहा…

राजेश भाई,
मोहम्मद रफ़ी लोकप्रियता के मायने में भाई। आवाज़ की तुलना नहीं कर रहा था। खैर।
हमनें गोपाल बाबू गोस्वामी जी और हीरा सिंह राणा जी के बारे में पहले भी बहस की हैं। राणा जी का घर पर आना जाना था। आवाज़ तो अब याद नहीं। और जो गोस्वामी जी का राणा जी के गीत चुराकर गाने वाला मामला था (अजय ढोंढियाल के मुताबिक) उसकी पुष्टि मैनें अपने पिताजी और उनके मित्रों से करनी चाही जोकि इन दोनों के ही हमउम्र हैं। उन्होनें ऐसी किसी बात से साफ़ इन्कार कर दिया। बाद में मुझे पता चला कि बेड़ु पाको का संगीत मोहन उप्रेती जी ने तैयार किया था। अब इसके बाद ढोंढियाल की बात मानने का जी नहीं करता।

Mired Mirage ने कहा…

अहा! यह गीत पहली बार सुना है।
घुघूती बासूती

 

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