बुधवार, 2 सितंबर 2015

एरेस तू

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यूरोप दूसरे विश्वयुद्ध की त्रासदी से विश्वयुद्ध के बाद भी लम्बे समय तक न सिर्फ आर्थिक, बल्कि मानसिक तौर पर भी जूझता रहा। युद्ध की क्षति से उबरने में इन देशों को काफी वक़्त लगा। इस बीच यूरोपीयन ब्राडकास्टिंग यूनियन ने लोगों के हल्के-फुल्के मनोरंजन के लिए गानों की एक सालाना प्रतियोगिता शुरू करने का निर्णय लिया। यह १९५५ की बात है। अगले साल धूमधाम से यूरोपीयन सॉन्ग कॉन्टेस्ट की शुरुआत लुगानो, स्विट्ज़रलैंड में हुई। इस प्रतियोगिता को यूरोविज़न कांटेस्ट के  नाम से जाना गया। पहले साल सात देशों ने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। आजतक तकरीबन ५२ देश इस प्रतियोगिता में भाग ले चुके हैं और इस कार्यक्रम को न सिर्फ सबसे लम्बे समय चलने वाला कार्यक्रम माना जाता है बल्कि यह सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले टीवी कार्यक्रमों में से है।

इस कार्यक्रम की खूबसूरती इसमें है कि लगभग सभी देशों से आने वाले गीत आपको पसंद आएंगे। १९५६ का पुरस्कार स्विट्ज़रलैंड को "रिफ़्रेन" गीत के लिए मिला। खैर, इस गीत के बारे में बात फिर कभी। मेरा ध्यान जिस गीत ने एकाएक खींचा था वह १९७३ की प्रतियोगता में  दूसरा स्थान पाने वाला एक गीत था, जिसका नाम आप ऊपर पढ़ चुके हैं। हिस्पानी बैंड "मोसेदादेस" को अपने गीत "एरेस तू" के लिए यह पुरस्कार मिला था। बाकी गीतों की अपेक्षा यह ज़्यादा कर्णप्रिय गीत है; इतना कि इसका अंग्रेजी वर्शन "टच द विंड" भी खासा मक़बूल हुआ था अंग्रेजी के अलावा मोसेदादस ने ही इस गीत के अलग संस्करण पांच अलग भाषाओं में गाए। इसके बाद तो इस गीत को कई अन्य भाषाओं में अलग-अलग लोगों द्वारा गाया गया।

पिछले दिनों एक ख़ास प्रोजेक्ट के लिए मैंने अपनी टीम में एक ब्राज़ीलियाई, एक स्पेनी, एक ताईवानी और एक जापानी कन्या को छः - छः महीनों के लिए लिया। इत्तेफ़ाकन ब्राज़ीली और स्पेनी कन्याएं एकनामा हैं - आक़ेल; हालांकि लिखने का तरीका अलग-अलग है। बहरहाल, एक-दूसरे की संस्कृतियों को समझने को कोशिश करते हुए हमारी अक्सर चाय-कॉफ़ी के दौरान कभी चीन-जापान, कभी ब्राज़ील और कभी स्पेन-भारत के बारे में बातें होती हैं। संगीत इन चर्चाओं का अनिवार्य अंग है। एक दिन हिस्पानी संगीत की चर्चा छिड़ी तो मुझसे पूछा गया कि मुझे क्या और कौनसे गायक/बैंड पसंद हैं। ज़ाहिर है खुलिओ इग्लेसिआस इनमे से एक नाम थे। दूसरा कोई नाम मैंने नहीं लिया लेकिन मोसेदादस का ज़िक्र किया। हिस्पानी आक़ेल प्रतिक्रियास्वरूप खिलखिला दी और बोली, "आप अपने पैदा होने से पहले के गाने सुनते हो?"

दूसरी आक़ेल ने मेरा समर्थन करते हुए कहा कि उसे रोबेर्टो कार्लो के गाने बेहद भाते हैं और वह भी उसके पैदा होने से पहले गाता था। लेकिन जो बात नोटिसेबल थी वह उसने बाद में कही, "संगीत की कोई उम्र नहीं होती।"



नीचे गीत के बोल पहले स्पेनिश में, फिर अंग्रेजी में।

Como una promesa, eres tu, eres tu
Como una manana de verano
Como una sonrisa, eres tu, eres tu
Asi, asi, eres tu.
Toda mi esperanza, eres tu, eres tu
Como lluvia fresca en mis manos
Como fuerte brisa, eres tu, eres tu
Asi, asi, eres tu 
Eres tu como el agua de mi fuente 
(Algo asi eres tu)
Eres tu el fuego de mi hogar
Eres tu como el fuego de mi hoguera
Eres tu el trigo de mi pan 
Como mi poema, eres tu, eres tu
Como una guitarra en la noche
Todo mi horizonte eres tu, eres tu
Asi, asi, eres tu 
Eres tu como el agua de mi fuente
(Algo asi eres tu)
Eres tu el fuego de mi hogar
Eres tu como el fuego de mi hoguera
Eres tu el trigo de mi pan 
Eres tu... 

[English translation]
Like a promise, you are, you are
Like a summer morning
Like a smile, you are, you are
Like that, like that, you are
All my hope, you are, you are
Like fresh rain in my hands
Like a strong breeze, you are, you are
Like that, like that, you are

You are like the water of my source
(Something like that, you are)
You are like the fire of my home
You are like the fire of my bonfire
You are like the wheat of my bread
You are
Like a poem, you are, you are
Like a guitar in the night
My whole horizon, you are, you are
Like that, like that, you are


यह माना जाता रहा है कि यह गीत यूगोस्लाविया के १९६६ के एक गीत "Brez besed" की कॉपी है। मेरी राय में इस गाने में युगोस्लावी गाने का प्रभाव संभवतः हो लेकिन इसके बावजूद अपनी संरचना और भव्यता में एरेस तू Brez besed से अलग खड़ा नज़र आता है। फिलहाल तो आप इस गीत का लुत्फ़ लीजिये। 

बुधवार, 5 जून 2013

फिर इलायाराजा और थोड़ा सा सावन

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मानसून ने दक्षिण में अभी दस्तक दी ही है लेकिन केरल और बंगलौर में एक सप्ताह पहले से ही फुहारें पड़ रही हैं - प्री-मानसून बोनान्ज़ा। बंगलौर में जब बादल छाते हैं तो छंटने का नाम नहीं लेते। मानव की करतूतों से बौराया मानसून अगर सुर में रह पाया तो नवंबर तक सूरज की छुट्टी। इस बीच यूहीं परसाई को पढ़ने बैठ गया और "आयी बरखा बहार" और "राम का दुःख और मेरा" जैसे निबंधों पर अटक गया। पिछले बृहस्पत शाम को ताबड़तोड़ बारिश हुई और बंगलौर के निचले इलाकों में पानी भर गया। लोगों के घरों के तालाब हो जाने की तस्वीरें तो हर साल अखबारों में छपती ही हैं लेकिन इस बार यह मानसून के आने से पहले ही हो गया है। उसपर तुर्रा यह कि इस बार मानसून के पिछले कई सालों के रिकार्ड तोड़ने की उम्मीद की जा रही है। यानि जिन घरों में सिर्फ तालाब बना करते थे वहां अब कृष्णा-कावेरी बहेंगीं। जो बाल्टियाँ घर में पानी लाने के लिए इस्तेमाल की जाती थीं वे पानी उलीचने के लिए इस्तेमाल की जायेंगीं।
हमारे देश में कुछ चीज़ें पौराणिकता और आधुनिकता से ऊपर की रही हैं। बरसाती नालों का गृहप्रवेश उन्हीं में से एक है। परसाई ने क्या लिखा था? - "आसमान के और मेरे ह्रदय में एक साथ धड़कन हो रही है। कविता लिखने के लिए व्यर्थ भय की अनुभूति नहीं बुलाता। यह वास्तविक भय है जिसके सामने कविता नहीं लिखी जाती, जान बचाई जाती है। घर में इतना पानी भर जाता है कि कभी सोचता हूँ कि अगर फर्श का न होता, तो इन कमरों में धान बो देता।" 
गरीब का सच आज भी नहीं बदला; वह सावन का लुत्फ़ लेने की बजाय घर से पानी उलीचने में व्यस्त है। ग़रीब तो खैर ग़रीब है, मेरी ही सोसाइटी में जिन लोगों के घर खुले की और हैं वे बारिश के बाद बालकनी में परदे-पोछे निचोड़ते नज़र आते हैं। भारत का मध्यवर्ग दूसरी ही किस्म की ग़रीबी का मारा है - जीरो टाउनशिप प्लानिंग।

खैर जाने दॆजिये। मैं तो मानसून के लिए पलकें बिछाए बैठा हूँ। धरती माँ को पानी मिलेगा तो प्यास मेरी बुझेगी। सावन हर जगह ही हरा होता है लेकिन बंगलौर में मौसम बहुत रोमांटिक हो जाता है और इस मदमस्त ब्लॉगर को समझ नहीं आता कि इस मौसम का लुत्फ़ कैसे उठाया जाए। अलसुबह दफ्तर को निकलो या देर रात घर के लिए मौसम एक सा ही बना रहता है। अब एक हफ्ते से समझ नहीं आ रहा कि किस किस्म का संगीत सुना जाए। बहुत खंगाला फिर भी ऐसा कुछ नहीं मिला तो मूड को साध और उससे भी ज़्यादा संभाल सके। ऐसे दिलकश मौसम में बन्दा छुईमुई किस्म का हो जाता है और मूड संभालने की ज़रुरत ज़्यादा हो जाती है। 
आज दफ्तर में एक मित्र से सिनेमा पर बात होते हुए बात निकली कि भारतीय सिनेमा में इमोशंस का बाज़ार बहुत बड़ा है और कुछ निर्देशकों ने इसे सलीके से भुनाया भी है। होते-होते मुझे मणि रत्नम की 'मौन-रागम' और 'दलपति' फिल्मों की याद हो आई। दलपति फिल्म का पहला दृश्य सिनेमाटोग्राफी और संगीत के लिहाज से गजब का है। सिनेमाटोग्राफी की बात निकली है इसलिए विडिओ लगा रहा हूँ यहाँ। सिनेमाटोग्राफी संतोष सीवान की है और ज़ाहिराना तौर पर संतोष सीवान ने अपना जादू दिखाया है। संगीत इलायाराजा का है और मुझे लगता है मानसून के रहते मैं उन्हीं की गिरफ्त में रहने वाला हूँ। यह गीत जितने बार भी देखता-सुनता हूँ टीस उठने को होती है। 
इत्तेफ़ाकन यह भी बताता चलूँ कि गीत जानकी ने गाया है जिन्होंने अभी महीने भर पहले ही पद्म-भूषण पुरस्कार यह कहकर लौटा दिया था कि दक्षिण भारतीय कलाकारों को सम्मान समय पर नहीं मिलता। इस आवाज़ का मैं फ़ैन हूँ। गीत सुनकर आप अपना मत बना सकते हैं। 




Chinna thai aval thandha rasave
Mulil thondriya chinna rosave
Solava? Araro,
Nam sondagal yar-yaro
Undhan kannil yenthaan niro?

(Chinna thai aval)

Dear one from a young mother
Little rose found among thorns
Shall I tell you, sweet one,
Who are all our kin?
Why are there tears in your eyes?
Paal manam veesum poo mugham
Paarkayil pongum thai manam
Aayiram kalam our varam
Vendhida vandha poocharam
Veyil vidhiyil vaada koodumo
Deival kovilai chendre serumo
Endhan tenare

(Chinna thai aval)

A soft flower like face which smells like milk
Your mother’s heart blooms when she looks upon you
A thousand years, I had one wish (to have my child)
You are [like] string of flowers which is result of my prayers [of thousand years]
Will you wilt out in the sun?
Or make it to the temple?
My river of honey
Solava? Araro,
Nam sondagal yar-yaro
Undhan kannil yenthaan niro?

(Chinna thai aval)
गीत के शब्द और अनुवाद यहाँ से उठाये गए हैं।

सोमवार, 6 अगस्त 2012

गाना भी आसान और लड़ना भी नहीं मुश्किल

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चीनी फिल्मों के जिस रूप से हम आमतौर पर रूबरू होते हैं वे शुरू से कुंग-फ़ू प्रधान रही हैं. हालाँकि साथ ही यह भी सच है कि चीनी फ़िल्में कुंग-फ़ू से भी आगे जाती हैं जैसे भारतीय फ़िल्में बॉलीवुड के अलावा भी बहुत कुछ हैं. इन मार्शल आर्ट फिल्मों में कुछ बड़े नाम भारत में भी मशहूर हैं जैसे ब्रूस ली, जैकी चान, सेमो हांग और जेट ली आदि. जैकी चान और जेट ली की फ़िल्में तो हमारे यहाँ बड़े पैमाने पर रिलीज़ होती हैं; खासकर जैकी चान की. वे एशिया के सबसे महंगे फिल्म कलाकार हैं. उनके बाद दूसरा नंबर रजनीकांत का आता है.






जैकी चान अक्सर कहते हैं कि वे फ़िल्में बनाते समय इस बात का ख्याल रखते हैं कि उनका बच्चों पर ग़लत असर न पड़े और पूरा परिवार साथ बैठकर उनकी फ़िल्में देख सके. यदि आपने उनकी फ़िल्में देखी हों तो आप पायेंगे कि यह सच भी है. बचपन में जब पहली बार उनकी तीन फ़िल्में एक के बाद एक देखीं थीं तो हफ़्ते भर तक हवा में उड़कर लोगों की हड्डियां तोड़ने के ख़्वाब देखता रहा था. यह सपना तो पूरा नहीं हुआ मगर कुंग फ़ू फ़िल्मों से मेरे लगाव में कोई कमी नहीं आई. मेरे कलेक्शन में जैकी चान और जेट ली की तमाम फ़िल्में हैं. सेमो हांग और बिआओ यूएन की भी जितनी फ़िल्में मिल सकीं मेरे पास मौजूद हैं. यिप मान सरीखी फ़िल्मों को भी मैं बड़े चाव से देखता हूँ.

जैकी चान की फिल्मों को आसानी से एक्शन फिल्मों की श्रेणी में रखा जा सकता है मगर वहाँ आपको कभी खून-खराबा नहीं दिखेगा और जितना भी एक्शन दिखाई देगा उसमें अनिवार्यतः हास्य का पुट होगा. बच्चों को ध्यान में रखते हुए ही उनकी फ़िल्मों में लिपलौकिंग या अंतरंग दृश्य नदारद होते हैं.

यह सभी जानते हैं कि चान अपने स्टंट खुद ही करना पसंद करते हैं और वे चाहते हैं कि उनके साथी कलाकार भी ऐसा ही करें. ऐसा हमेशा संभव नहीं होता. उनकी अपनी स्टंट की एक टीम है जो फ़िल्मों में साथी कलाकारों के स्टंट भी करती है या उसमें मदद करती है.
अगर बात करता गया तो बात खींचती ही जायेगी. जैकी चान पर और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है मगर यहाँ बात संगीत की होनी चाहिए.

उनके देश के बाहर जैकी चान की फ़िल्में देखने वाले जयादातर लोग यह नहीं जानते कि जैकी चान प्रसिद्द और सफल गायक भी हैं. उनके खाते में अबतक तकरीबन बीस एल्बम हैं. बीजिंग ओलंपिक्स का काउंटडाउन गीत (वी आर रैडी) जैकी चान ने ही गया था. अगर बगैर मेहनत किये उनका कोई गीत सुनना हो तो उनकी फिल्म के अंत में टाइटल गीत सुनिए. संभावना इसी बात की ज़्यादा है कि गीत उन्हीं की आवाज़ में होगा.

दूसरा आसान तरीका नीचे लगे गीत को सुनना है. यह गीत जैकी की नवीं अल्बम फर्स्ट टाइम से है और महिला स्वर सारा चेन का है. जाते जाते यह भी बताता चलूँ कि जैकी ने पहली बात मेंडरिन में इस एल्बम में गाया था. इससे पहले की उनकी एलबम्स अंग्रेजी, जापानी और केन्टोनीज़ में थीं. अब यह बताना भी ज़रूरी लग रहा है कि हांगकांग में केटोनीज़ बोली जाती है जबकि मेनलैंड चाइना के ज़्यादातर हिस्सों में मेंडरिन.






(Sarah) 
Transparent is my heart 
I long to share my emotions and affection with you 
But my heart has been hurt before. 
What sweet dreams I have and hate to wake. 

(Jackie) 
In dreams your eyes are so warm and tender. 
You understand my heart and my spirit. 
Please let me lean on you when I need you. 
Transparent is my heart 

(Sarah) 
The stars are as bright as the light in your eyes 
My heart is loneliest without you. 
Don't tell me it's too late for love. 
When I'm with you my heart is at peace. 
The tears won't flow anymore. 

(Jackie) 
Transparent is your heart 
I long to share my emotions and affection with you 

(Sarah) 
But my heart has been hurt before. 
What sweet dreams I have and hate to wake. 
Transparent is my heart 
I long to share my emotions and affection with you 
But my heart has been hurt before. 
What sweet dreams I have and hate to wake. 

(Jackie) 
In dreams your eyes are so warm and tender. 
You understand my heart and my spirit. 
Please let me lean on you when I need you. 
Listen to your heart and love me. 

(Sarah) 
The stars are as bright as the light in your eyes 
My heart is loneliest without you. 
Don't tell me it's too late for love. 
When I'm with you my heart is at peace. 
The tears won't flow anymore. 


शुक्रवार, 29 जून 2012

हवा में सुर

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कुछ वक़्त पहले इलायाराजा की एक अल्बम 'नथिंग बट विंड' हाथ लगी. यह उनकी दूसरी नॉन-फ़िल्मी अल्बम थी जिसे उन्होंने 1988 में कम्पोज़ किया था। इसमें बतौर बांसुरीवादक  हरिप्रसाद चौरसिया का भी सहयोग था और जैसा कि नाम से ही मालूम पड़ता है अल्बम  सुषिर वाद्यों पर आधारित है।

इस अल्बम को सुनते हुए दो चीज़ें एकदम ध्यान आकर्षित करती हैं। किसी भी ट्रैक को सुनते हुए लगता है कि यह किसी फ़िल्म का हिस्सा है और अगर आप इलायाराजा के संगीत से परिचित हैं तो यह अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल नहीं कि यह उनके तरीके का संगीत है। दोनों ही बातों के पीछे शायद कारण यह है कि इलायाराजा ने सभी ट्रैक्स के लिए अपनी किसी न किसी फ़िल्म के गीतों को ही आधार बनाया है।




ज़्यादातर लोगों को अकसर अल्बम का टाइटल ट्रैक 'नथिंग बट विंड' अधिक पसंद आता है पर मुझे 'कोम्पोसर्स ब्रेद' बेहद  प्रिय है। वही साझा कर रहा हूँ।


मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

दक्षिण के छोटे राजा

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इस पोस्ट का इधर लग पाना तकरीबन १०-११ महीनों तक लगातार स्थगित होता रहा. विश्वास कीजिए कि इससे ज़्यादा दिनों तक मैंने कोई पोस्ट टाली नहीं है और इतने लोगों के हाथ-पैर नहीं जोड़े जितने इस पोस्ट के लिए.

इलयाराजा का नाम उत्तर भारत में अपरिचित नहीं हैं. अक्सर दक्षिण भारतीय अपने लिए उत्तर भारत में तब तक जगह नहीं बना पाते, जबतक वे वहां जाकर कुछ काम न करें. बहुत ही कम लोग इस मामले में अपवाद बन पाए हैं. इलयाराजा ऐसे ही हस्तियों में से हैं. फिर भी मुझे पूरा विश्वास है कि आज भी ऐसे कितने ही लोग हैं जिन्होंने इलायाराजा का नाम नहीं सुना है. एक तो मेरे दफ्तर में ही है, जिसे बंगलुरु आए दो महीने ही हुए हैं.

इलायाराजा के गीतों को तकरीबन एक साल पहले सुनना शुरू किया था और तबसे कुछ और नहीं सुना होगा. ऐसा अमूमन मेरे साथ नहीं होता. इसके कारण की चीर-फाड़ करने में भी वक़्त लगेगा. दक्षिण-भारतीय फ़िल्मी संगीत पूरी तरह से भारतीय होने पर भी आपको कुछ अलग महसूस होगा. सुन्दर से सुन्दर गीत में भी कम्पोसिशन में कई बार एक तरह का डिस्कनेक्ट होता है जो शुरुआत में थोड़ा चुभता है बस शुरुआत में ही. इलायाराजा के गीत भी इस मामले में अपवाद नहीं हैं. वे वाद्यों के गुरु हैं और उनके गीतों को ध्यान से सुना जाए तो आप पाएंगे कि एक तो वे वाद्यों से खेलते हैं और दूसरा चाहे कितने ही पश्चिमी वाद्यों का प्रयोग करें, उनके गीत पूरी तरह भारतीय ही रहते हैं.




इलायाराजा के संगीत पर एक से ज्यादा पोस्ट लगाने का इरादा है. शुरुआत ऐसे गीत से की जाए जिससे लोग पूरी तरह अपरिचित नहीं है.
शायद लोग "सदमा" फिल्म नहीं भूले होंगे. यह फिल्म दरअसल तमिल फिल्म "मून्द्रम पिरई" का रीमेक है. इस फिल्म का संगीत इलयाराजा ने ही दिया था. फिल्म का गीत "कन्ने कऴेमाने" बेहद कर्णप्रिय है और येसुदास की आवाज़ ने इस गीत में भोलापन  भर दिया. हिंदी में यह गीत "सुरमई अखियों में..." है.
इस गीत के बारे में बात करते हुए मेरे तमिल मित्र इसके साथ थोड़ा रहस्य जोड़ते रहे हैं. इसे तमिल के कवि और गीतकार कन्नादासन ने लगभग अपनी मृत्युशैया पर लिखा था. यह उनका आखरी गीत था और इस बात का उनको इल्म था. कहा जाता रहा है कि इस गीत में कुछ और भी मतलब छिपा हुआ है जोकि गीत से ज़ाहिर तो होता है मगर मतलब हाथ नहीं आता.

इस पोस्ट को स्थगित करते रहने का कारण यही था. मैं वह मतलब  ढूंढता रहा. मुझे इस गीत का जो अंग्रेजी तर्जुमा मिल पा रहा था, वह बेहद हास्यास्पद था. इस चक्कर में कुछ ऐसे लोगों से भी पूछ बैठा जिनसे शायद नहीं पूछना चाहिए था. ऐसा ही चलता रहा तो शायद अनुवाद की पूंछ पकड़ने की आदत छोड़ ही देनी पड़ेगी.
हाँ, अगर कभी हिंदी अनुवाद हो सका तो लगा दिया जायेगा.



बुधवार, 29 जून 2011

एक कहानी का आरम्भ और अंत

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John Denver had the ability to convey (love to be precise) more than the words in the song itself.
यही वजह है कि उसके गीत प्रेम में पगे लगते हैं; तब तो और भी जब वह प्रेम गीत गा रहा होता है। 'एनीज़ सॉंग' इसलिए ख़ास नहीं कि उसके शब्द बहुत अर्थवान हैं या उनमें  कमाल की पोएट्री है। नहीं, 'एनीज़ सॉंग' तबतक एक साधारण गीत है जबतक उसे जॉन डेनवर की आवाज़ में ना सुना जाए। यकायक दस मिनट के अन्दर लिख दिए गए इस गीत में बिलकुल साधारण शब्द हैं पर जिस तरह से जॉन ने इसे कम्पोज़ किया है और उससे भी महत्वपूर्ण जिस तरह से गाया गाया है वह इस गीत को युनीक बना देता  है। मुखड़े पर पहुँचने से पहले गिटार के स्ट्रिंग गीत की नीव को मज़बूत बनाते हैं जैसे उल्लास बहुत धीमे - धीमे ऊपर उठ रहा हो। फिर जॉन की आवाज़ बारिश के पानी की तरह फैलने लगती है। मगर ठहरिये, गीत अपने आवेग पर तब आता है जब जॉन पहले मुखड़े पर पहुँचता है।

जॉन ने यह गीत दस - पंद्रह मिनट में लिखकर ख़तम कर दिया था। लिखा था अपनी पहली पत्नी के लिए। इस गीत को सुनते हुए महसूस होता है जॉन अपनी पत्नी को कितना प्यार करता होगा और इस गीत को बनाते हुए वह एनी के प्यार में कितना तल्लीन रहा होगा। मुझे लगता है यह प्रेम की चरम अभिव्यक्ति है जो मैंने देखी है; महसूस की है।

मुझे मालूम नहीं मगर लगता है जॉन का दूसरा गीत 'द गेम इज़ ओवर' इस प्रेम के अंत की अभिव्यक्ति है। यह गीत भी उतना ही ज़रूरी है जितना 'एनीज़ सॉंग'। 'एनीज़ सॉंग' में ज़बरदस्त आवेग है तो 'गेम इज़ ओवर' में यह आवेग विस्थापित होकर मृत्यु के बाद की चुप्पी में बदल जाता है। इन दो गीतों को एक के बाद एक सुनना अपने आप में एक कहानी का आरम्भ और अंत लगता है; एक पूरी कहानी।



You fill up my senses like a night in the forest.
Like the mountains in spring time
like a walk in the rain
like a storm in the desert
like a sleepy blue ocean
You fill up my senses, come fill me again.

Come let me love you, let me give my life to you
Let me drown in your laughter, let me die in your arms.
Let me lay down beside you, let me always be with you.
Come let me love you, come love me again.




Time, there was a time
You could talk to me without speaking
You would look at me and I'd know
All there was to know

Days, I think of you
And remember the lies we told
In the night, the love we knew
The things we shared 
when our hearts were beating together

Days, that were so few
Full of love and you
Gone, the days are gone now
Days, that seem so wrong now

Life, won't be the same
Without you to hold again in my arms
To ease the pain and remember
When our love was a reason for living

Days, that were so few
Full of love and you
The game is over 

गुरुवार, 2 जून 2011

दूर दक्षिण से एक ताज़ातरीन गीत

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कुछ समय पहले उरुमी नाम से एक मलयालम फ़िल्म बनी थी. खूब चर्चा में भी रही; सिर्फ केरल में ही नहीं बाहर भी. एक कारण तो यह कि अब तक की यह दूसरी सबसे महँगी मलयालम फ़िल्म थी और दूसरा यह कि इस फ़िल्म की कहानी एक प्रसिद्ध योद्धा पर आधारित है. हालाँकि केलु नामक इस नायक के बारे में ऐतिहासिक तथ्य मौजूद नहीं हैं किन्तु उसके अस्तित्व को नाकारा भी नहीं जा सकता. माना जाता रहा है कि केलु नयनार को अमरीका जैसी आफ़त खोजने वाले वास्को ड गामा की हत्या का काम सौंपा गया था. हत्या का कारण निश्चित ही अमरीका की खोज नहीं था. सोलहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में वास्को ड गामा पुर्तगाल की ओर से पुर्तगाली आधिपत्य वाले भारतीय भूभाग के वायसराय थे.

संतोष सिवान का नाम हिंदी सिनेमावालों के लिए नया नहीं है. असोका जैसी बेवकूफ़ाना फ़िल्म बनाने वाले सिवान ने कुछ बेहतरीन फ़िल्में भी बनायीं हैं जैसे तहान. उरुमी भी उन्ही की फ़िल्म है और फ़िल्म के कुछ दृश्य देखने के बाद मैं कह सकता हूँ कि सिनेमाटोग्राफी के कमाल को नाकारा नहीं जा सकता. संतोष पेशे से सिनेमाटोग्राफर हैं और इस फ़िल्म में सिनेमाटोग्राफी भी उन्हीं की है.

जानता हूँ बात खिंचती जा रही है फिर भी एक बात और जोड़ना ज़रूरी लग रहा है. कुछ अरसा पहले मेरे एक मलयालम मित्र ने मुझसे पूछा कि हिंदी फ़िल्मों में पश्चिमी वाद्यों का इस्तेमाल इतना ज़्यादा क्यों होता है? उसके सवाल पूछने की वजह मुझे मालूम थी इसलिए मैं उसकी जिज्ञासा शांत कर सका. ऐसा नहीं कि दक्षिण भारतीय फिल्मों में पश्चिमी वाद्यों का इस्तेमाल नहीं होता, मगर मलयालम सिनेमा मलयाली लोगों की ही तरह बाकी के दक्षिण भारतीय सिनेमा से कुछ हद तक अलग है. किसी भी वाद्य का इस्तेमाल हो मगर गीत सुनने में भारतीय ही लगता है. उरुमी फ़िल्म के कुछ गीत कर्णप्रिय हैं और मेरे ख़याल से ऐसा इसलिए है क्योंकि संतोष ने संगीतकार दीपक देव को पश्चिमी वाद्यों के इस्तेमाल से दूर रहने की हिदायत दी थी. इसका असर गानों में दीखता है और आपको लगेगा की आप वाकई सोलहवीं शताब्दी में बैठे ये गाने सुन रहे हैं. फ़िल्म के बाकी गीतों की बनिस्पत चिम्मी चिम्मी गीत ज़्यादा प्रसिद्ध हुआ है. इस फ़िल्म के संगीत की प्रसिद्धी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बंगलौर में जहाँ वैसे मलयाली गाने नहीं सुनाई देते, वहां भी चिम्मी चिम्मी यदा कदा सुनाई दे जाता है.

नीचे गीत का वीडियो लगा रहा हूँ जिससे सिनेमाटोग्राफी की भी थोड़ी झलक मिल जाये. साथ ही गीत के बोल भी. हिंदी तर्जुमे की उम्मीद इस ग़रीब के साथ ज्यादती होगी क्योंकि मलयालम को मैं भारत की सबसे ज़्यादा  विदेशी भाषा मानता हूँ. मेरे आधे से ज़्यादा सहकर्मी मलयाली हैं मगर कोई भी इस गीत का तर्जुमा करने को तैयार नहीं हुआ. ज़्यादातर लोग इस बारे में ही निश्चित नहीं थे कि गीत में चिम्मी चिम्मी कहा गया है या चिन्नी चिन्नी.
आखिर में यह भी बताता चलूं कि उरुमी का मतलब लचीली तलवार होती है. बाकी विकिपीडिया तो है ही.





Chimmi chimmi minni thilangana
vaaroli kannanukk
poovarash pootha kanakkane
anjunna chelanakk..
nada nada annanada kanda theyyam mudiyazhakum
nokk vellikinnam thulli thulumbunna chele..
(chimmi chimmi)
kolathiri vazhunna nattile valiyakarenne
kandu kothikum
illatholloramba kore neram kandu kaliyakum
samothiri kolothe anunga
mullapoo vasana ettumayangum
valittenne kannezhuthikkan varmukilodivarum
poorampodi paariyittum poorakaliyaditum
nokkiyilla nee ennitum neeyenthe
(chimmi chimmi)
poovambante ola chuvachoru
karimpuvillathe padathalava
vaaleduth veeshalle njanath murikin poovakkum..hmm
allimalar kulakadavile ayaluthi pennunga kandupidikum
nattunadappothavar nammale kettunadappakum
enthellam paditum mindathe mindittum
mindiyilla nee ennitum neeyenthe

मंगलवार, 10 मई 2011

देवो मोहे धीर

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मैं रोज़ रात को कुछ न कुछ संगीत सोने से पहले सुनता हूँ; खासतौर पर शास्त्रीय या उपशास्त्रीय संगीत. इसी सीरीज में आजकल पंडित कुमार गन्धर्व का गायन चल रहा है. यकीन जानिये अँधेरे कमरे में इस आवाज़ से दिव्य कुछ नहीं लगता.

ज़रा राग टोडी में इस बंदिश को सुनिए इस पावन स्वर में.






यह सिलसिला अभी जारी रखने का इरादा है. अगर आलस ने साथ न दिया तो आपको कुछ और पंडित जी की आवाज़ में ज़रूर सुनाया जायेगा.

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

चुपकी सी अजब शहर-ए-ख़मोशाँ ने लगाई

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आज कुछ अनचाहा घटा। सोचते-सोचते उन दिनों की ओर ख़याल चला गया जब  ऑल इंडिया रेडियो के एफ़ एम चैनल के सुनहरे दिन थे। बुधवार रात को एक प्रोग्राम आता था - 'आवाज़ और अंदाज़' - एक महिला और एक पुरुष स्वर। अब नाम भूल चला हूँ। बेहद संजीदा लोग; बेहद परिपक्व आवाज़ और संगीत का ज्ञान। उस प्रोग्राम में अक्सर बहुत सुंदर और अनसुना संगीत सुनने को मिलता था। जैसा प्रफुल्लित मन उन दिनों था वैसा कभी नहीं रहा शायद इसीलिये ध्यान उस ओर चला गया। ख़ैर - सब दिन एक समान नहीं रहते।

नय्यारा नूर की आवाज़ में एक गज़ल सुनी था जिसे मैं इतने सालों तक भूला रहा। दो-एक दिन पहले सोचा कि अब कुछ दिनों तक ताज़ा स्टॉक में से कुछ सुना जाए। नय्यारा नूर की ग़ज़लें लेकर बैठा तो यह गज़ल भी बज उठी। उन दिनों से यह गज़ल मेरे लिये हर कोण से जुड़ी है। साझा करने का मन हो उठा।



मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

याद पिया की आए…

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ठुमरी से मेरी पहली मुठभेड़ तकरीबन-तकरीबन कॉलेज जाने की उम्र में हुई थी, प्रहार फिल्म के ज़रिये। उस समय और उसके बाद के कुछ सालों तक ठुमरी या और किसी उपशास्त्रीय संगीत से कोई ख़ास साबका नहीं पड़ा। उस दौर में फ़िल्मी संगीत इस हद तक स्तरहीन हो चुका था कि उसके और घटिया होने की गुँजाइश नहीं बची थी। हम दोस्त पुराने फ़िल्मी गीत सुनते थे और वहाँ से होते हुए पुराने ग़ैर-फ़िल्मी संगीत की ओर मुड़े। फिर उधर से ग़ज़लों की ओर। इतना परिपक्व होने में भी कई साल लग गए कि शास्त्रीय संगीत की ओर रुख़ करते। ऐसे समय में यदा-कदा कोई ऐसी चीज़ सुनाई दे जाती कि यकीन होता शास्त्रीय संगीत से परहेज़ की या डरने की कोई वजह नहीं।

बात प्रहार फ़िल्म की हो रही थी, जिसमें शोभा गुर्टू जी की गाई ठुमरी 'याद पिया की आए' सुनी थी। आज कई दिनों बाद आइपॉड पर ठुमरी सुनने बैठा तो शफ़ल मोड पर यही ठुमरी गुर्टू जी की आवाज़ में चलने लगी। उसके ठीक बाद फिर से यही ठुमरी बड़े गुलाम अली साहब की आवाज़ में भी चल पड़ी।

तकनीक बहुत बड़ी नेमत है इसका ख़याल मुझे बार-बार संगीत के दिग्गजों को सुनते हुए होता है, जो अब हमारे बीच नहीं हैं या जिन्हे लाइव सुनने का इत्तेफ़ाक़ अभी हुआ नहीं है। आज भी जब यही ठुमरी ऐसे मूर्धन्य गायकों की आवाज़ में एक के बाद एक सुनने को मिली तो वैसा ही महसूस हुआ। तो ब्लॉग पर आज क्यों न दोनों ही आवाज़ों में यही ठुमरी लगाई जाए?











रविवार, 30 जनवरी 2011

एक कर्णप्रिय कन्नड़ गीत

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सन 2006 में एक कन्न्नड़ फ़िल्म रिलीज़ होती है, जिसके भविष्य के बारे में कोई आश्वस्त नहीं है। कारण? लगभग अनजान दिगदर्शक और उससे भी ज़्यादा अनजान नायक। फ़िल्म सिनेमा हॉल्स में आती है और जैसाकि कई फ़िल्मों के साथ हुआ है, रफ़्तार पकड़ती है और 90 लाख की लागत की फ़िल्म 76 करोड़ कमा लेती है; कन्नड़ सिनेमा के इतिहास में अभी तक का रिकार्ड। शायद यह गणित कई लोगों के पल्ले न पड़े मगर दक्षिण भारत में फ़िल्मों के लिये अद्भुत पागलपन होने के बावजूद कन्नड़ फ़िल्में अपने लिये अपेक्षित जगह नहीं बना सकी हैं। वे आज भी तमिल, तेलुगु और मलयालम फ़िल्मों के सामने दूसरे दरजे की ही ठहरती हैं। कर्नाटक में ही अन्य द्रविड़ भाषाओं की फ़िल्में ज़्यादा चलती हैं।



यह जो फ़िल्म है मुंगारु मलये या मुंगारु मड़ये न सिर्फ़ रिकार्ड बनाती है बल्कि कन्नड़ फ़िल्मों को एक दिशा भी देती है और एक तरह से कन्नड़ सिनेमा के लिये सर्वाइवल किट की तरह भी काम करती है। यह फ़िल्म नायक गणेश और दिग्दर्शक योगराज को कन्नड़ फ़िल्म इन्डस्ट्री की पहली कतार में खड़ा कर देती है। इस फ़िल्म की सफलता का बहुत बड़ा कारण इसका संगीत था। इस फ़िल्म के गाने पहले कन्नड़ गाने थे जो मैंने और कई उत्तर भारतीयों ने नोटिस किये; अद्भुत ताज़गी से भरे और बेहद कर्णप्रिय। आवाज़ जानी पहचानी लगी। फिर पता चला दो गीत सोनू निगम ने गाए हैं जोकि सबसे अधिक मक़बूल हुए। बाकी गीत भी प्रसिद्ध हुए हैं। सोनू निगम का नाम सुनकर हैरान न हों क्योंकि सिर्फ़ वही नहीं, हिन्दी पट्टी के कई और गायक इस ओर बहुत गीत गाते हैं। वैसे सोनू निगम का गाया अगर मुझे आजतक कुछ पसंद आया है तो वह इसी फ़िल्म के गीत हैं।
बहरहाल इस फ़िल्म का टाइटल ट्रैक मुंगारु मड़ये बाकी गीतों से ज़्यादा मशहूर हुआ है। वही सुना जाए आज।




अपने और आपके सुभीते के लिये मैनें नीचे गीत के बोल रोमन में लिख दिये हैं और उनका तर्जुमा हिन्दी में भी कर दिया है।

Mungaru Maleye
ओह सावन की पहली बारिश
Yenu ninna Hanigala Leele
तेरी बूँदों ने क्या जादू कर दिया

Ninna Mugila Saale, Dhareya Korala Premada Maale
तूने आकाश में ऐसे लकीर खींची, लगता है जैसे धरती के गले में प्रेम की माला
Suriva Olume Aajadi Malege, Preeti Moodide
झमझमाती बारिश के निर्झर बोध में प्रेम उमड़ रहा है
Yaava Chippinalli, Yaava Haniyu Muttaguvudo
जाने किस बूँद की सीप से मोती निकल आए
Olavu Yelli Kudiyoduvudo, Tiliyadagide
प्यार की कली कहाँ खिले मेरी समझ से परे है
Mungaru Maleye..
ओह सावन की पहली बारिश
Yenu ninna Hanigala Leele
तेरी बूँदों ने क्या जादू कर दिया

Bhuvi Kenne Tumba, Mugilu Surida Muttina Gurutu
जिस तरह आसमान पानी की बूँदें बरसा रहा है, धरती के गाल मोतियों के निशान से भर गये हैं
Nanna Yedeya Tumba, Avalu Banda Heggeya Gurutu
मेरा मन उसके आने की उत्सुकता से भरा हुआ है
Hegge Gegge Aa Savi Saddu, Premanadavoo
उसके पैरों की मीठी आमद, प्रेम की लय
Yede Mugilinalli, Rangu challi Nintalu Avalu
मेरे हृदय के आकाश में उसने रंग भर दिया है और वहाँ खड़ी है
Baredu Hesaru Kamanabillu, Yenu Modeyoo
उसका नाम लिखा है जैसे इन्द्रधनुष, आह कैसी बौछार है
Mungaru Maleye..
ओह सावन की पहली बारिश
Yenu ninna Hanigala Leele
तेरी बूँदों ने क्या जादू कर दिया


Yava Hanigalinda, Yava Nelavu Hasiraguvudo
किस बूँद से धरती का कौनसा हिस्सा हरा होगा
Yaara Sparshadindaa, Yara Manavu Hasivaguvudo..
किसके स्पर्श से किसकी आत्मा में प्रेम के अंकुर पनपेंगे
Yara Usirali Yara Hesaro Yaru Baredaro
किसकी साँसों में किसने किसका नाम लिख डाला है
Yava Preeti Huvu, Yara Hrudayadalli Ararluvudo
किसके प्रेम की कोंपल किसके हृदय में फूटेगी
Yaara Prema Poojege Mudipo, Yaru Balloro
किसका प्यार पूज्नीय है, कौन समझ सका है?
Mungaru Maleye..
ओह सावन की पहली बारिश
Yenu ninna Hanigala Leele
तेरी बूँदों ने क्या जादू कर दिया


Olava Chandamama Naguta Banda Manadangalake
खूबसूरत चाँद मेरे ज़ेहन में घूम गया
Preeti Belakinalli, Hrudaya Horatide Meravanige
प्रेम की रोशनी से दीप्त मेरा प्रेम एक यात्रा पर निकल पड़ा है
Avala Prema Doorinakadege, Preeti Payanavoo
उसकी प्रेम नगरी की ओर, प्रेम की यात्रा पर
Pranaya Doorinalli, Kaledu Hogo Sukava Indu
कुछ देर के लिये सुख तुम चले जाओ प्रेम नगरी से
Dhanyanaade Padedukondu Hosa Janmavoo
मैं एहसानमंद हूँ कि मुझे यह नया जन्म मिला
Mungaru Maleye..
ओह सावन की पहली बारिश
Yenu ninna Hanigala Leele
तेरी बूँदों ने क्या जादू कर दिया

सोमवार, 24 जनवरी 2011

जाऊँ मैं तोरे बलिहारी - पंडित भीमसेन जोशी को श्रद्धांजलि

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दो-दिन पहले पिछली पोस्ट लगाते हुए मालूम नहीं था कि इतनी जल्दी फिर एक पोस्ट लिखने बैठूँगा। यह उम्मीद तो कतई नहीं थी कि दु:ख के साथ ब्लॉग पर आना होगा। सुबह-सुबह अखबार में सबसे पहले पंडित भीमसेन जोशी जी के देहांत की खबर पर नज़र पड़ी। दिनभर टीवी पर उनके स्वर्गवास की खबर फ़्लैश होती रही। सभी ने कहा यह दु:खद समाचार है; एक युग का अंत है।
निश्चित ही एक युग का अंत है। मुझ जैसों के लिए तो इस युग से पहले शून्य था, बाद में भी शायद शून्य ही रहेगा। पं भीमसेन जोशी, पं जसराज, कुमार गंधर्व, सुब्बुलक्ष्मी, पं छन्नूलाल मिश्रा जैसे नामों ने इस युग को गढ़ा था, इनके साथ ही शायद इस युग का अंत हो जाए। पंडित जी ने कबीर को कितना गाया था, कितना मराठी में गाया था। सब अच्छा लगता था। इससे पहले एक ही बार उनका गाया यहां पोस्ट करने का इत्तेफ़ाक़ हुआ था। जब शास्त्रीय संगीत से गजभर की दूरी रखता था तब भी कही पंडित जी की आवाज़ में कोई भजन गाहे-बगाहे सुनाई दे जाता तो झट से उनकी आवाज़ को पहचानने की कोशिश करता जैसे अपने प्रिय फ़िल्मी गायकों की आवाज़ को पहचानता था।
देह नहीं है, आवाज़ तो रहेगी। पंडित जी की राग वृंदावनी सारंग में गाई यह रचना बहुत पसंद की जाती रही है और मुझे भी बेहद भाती है। श्रद्धांजली के रूप में वही पोस्ट कर रहा हूँ।


शनिवार, 22 जनवरी 2011

न्यौली और जोड़

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"कट्न्या-कट्न्या पौलि ऊँछौ चौमास कौ बन
बग्न्या पाणी थामी जांछौ नी थामीनौ मन"

ये पंक्तियां मुझे एकाधिक कुमाऊँनी गीतों/लोकगीतों में सुनाई दीं और मुझे यह जानकर हैरानी भी हुई और सुख भी कि लोकगीत कितनी सफलता से काव्यात्मक भी रहे हैं। इन पंक्तियों का अर्थ है कुछ यूँ है:

"बार बार कटते रहने पर भी चतुर्मास का वन फिर फिर पनप जाता है,
बहता पानी तो थम जाता है मगर मन नहीं थमता"

ऊपर लिखी पंक्तियां जोड़ कहलाती हैं। जोड़ में पहली और दूसरी पंक्ति में अकसर कोई परस्पर संबंध नहीं होता। यह आप अनुवाद पढ़कर समझ ही गए होंगे। उत्तराखण्डी लोकगीतों में जोड़ डालने की परंपरा है। जहां तक मेरी जानकारी है जोड़ डालने की परंपरा न्यौली गीतों में रही है जोकि मूलत: विरहगीत होते हैं। लोग जब लकड़ी काटने जंगलों में जाया करते थे तो न्यौली गाई जाती थी। एक ओर एक ने कोई जोड़ डाला तो प्रत्युतर में दूसरी ओर से कोई और जोड़ डालता था। ऐसा नहीं कि जोड़ पुराने ही दोहराए जाते थे। अकसर तात्कालिक रचे जाते। मनोरंजन और अभिव्यक्ति की यह परंपरा किसी ज़माने में बहुत समृद्ध रही होगी। मगर अब सब बहुत तेजी से बिसराया जा रहा है। अज्ञेय की कविता कुछ यूँ थी…

"जहां तक दीठ जाती है
फैली हैं नंगी तलैटियाँ
एक-एक कर सूख गए हैं
नाले, नौले और सोते
कुछ भूख, कुछ अज्ञान, कुछ लोभ में
अपनी संपदा हम रहे हैं खोते
ज़िदंगी में जो रहा नहीं, याद उसकी
बिसूरते लोकगीतों में
कहां तक रहेंगे संजोते?"

मैं अज्ञेय से इत्तेफ़ाक़ न रखते हुए एक कुमाऊँनी गीत यहां लगा रहा हूँ। पुरूष स्वर गोपालबाबू गोस्वामी जी का है। महिला गायक कौन हैं मुझे पता नहीं। मतलब के पीछे ज़्यादा न भागें। इतना जान लेना पर्याप्त होगा कि पति अपनी पत्नी से कह रहा है कि उसे छोड़कर मायके न जाए।

पुनश्चः: यह गीत न्यौली नहीं है और न ही इसमें जोड़ हैं।



शनिवार, 10 जुलाई 2010

घट घट में पंछी बोलता

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कुछ दिनों से ख़ूलियो इग्लेसियास के गाने सुन रहा था जिन्हें अपनी पत्नी के आग्रह पर मैनें उनके मोबाइल पर डाल दिया था। दरअसल अथर्व महाराज को गाने सुनने का अभी से बेहद शौक है। शौक इस हद तक है कि अगर अगर उन्हें सुलाना हो तो मोबाइल पर गाने चलने चाहिये और अगर वे आधी रात को उठ जाएं तो भी तबतक रोते रहते हैं जबतक गाने न चलने लगें। मेरी हमेशा से इच्छा थी कि मेरे बच्चों को संगीत में रुचि रहे मगर इस तरह की रुचि की मैनें कल्पना नहीं की थी। उसपर तुर्रा ये कि अथर्व को अक्सर ढोल-ढमाके वाले गीत पसंद आते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। अथर्व ने ख़ूलियो के गानों को खारिज कर दिया। खैर, संगीत वाइन की तरह होता है, धीरे-धीरे जज़्ब होगा और धीरे-धीरे टेस्ट बनेगा।



मैनें सोचा कि शायद दोस्तों को ख़ूलियो के गाने पसंद आएं और एक गाना पोस्ट करने के लिये छांट लिया मगर तभी किशोरी अमोनकर के कुछ गीतों पर नज़र पड़ी और कबीर के लिखे कुछ भजनों पर नज़र पड़ी जो किशोरी अमोनकर ने ‘साधना’ एलबम में गाये थे। दिन की शुरुआत के लिये ‘घट घट में पंछी बोलता’ से बढ़िया क्या हो सकता है?




गुरुवार, 20 मई 2010

पुराने गीतों की उम्र कितनी है?

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दर्द भरे गीतों, जिन्हे आज की पीढ़ी कुछ हिकारत और बहुत कुछ अजनबीपन से देखती है, की भारतीय फ़िल्मों में समृद्ध परंपरा रही है। गानों की एक पीढ़ी बहुत कुछ अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी की नौटंकियों से प्रभावित रही है या यह कहना ज़्यादा सही होगा कि मुम्बईया फ़िल्में एक विशेष संदर्भ में नौटंकियों का ही विकसित रूप हैं। नौटंकियों में जो प्रेम, मान-मुनौवव्ल, बिछोह-मिलन हुआ करता था प्रेमियों के इर्द-गिर्द घूमने वाली कथाओं का, उनकी अभिव्यक्ति के लिये प्राय: गीत-गज़लों का ही सहारा लिया जाता था। अपने आरंभिक दौर में फ़िल्मों का जो स्वरूप होता था उसमें और नौटकियों में कोई खास अंतर नहीं होता था। उन फ़िल्मों को आप अगर सेल्युलॉइड पर कविता न भी कह पाएं तो भी सेल्युलॉइड पर नौटंकी निस्संकोच कह सकते हैं। परदे के इस ओर बैठे दर्शक भी आपद् धर्म को नौटंकी के दर्शक की ही भांति निभाते आए हैं। नौटंकी के अभिन्न अंग की ही तरह हूट-हुंकार, वाह-वाह और तालियां सिनेमा में भी स्थापित हो गईं और आज भी जारी हैं और उसी तर्ज पर दो-एक इज़हार-ए-दर्द करने वाले गीत भी फ़िल्मों का हिस्सा बन गए। देखा जाए तो इन दर्द भरे गीतों ने गायकों-गीत-संगीतकारों को अपनी सृजनात्मकता के साथ प्रयोग करने की पूरी छूट दी जिसका खूब फ़ायदा उठाया गया। “सुहानी रात ढल चुकी”, “सुर ना सजे क्या गाऊँ मैं”, “शाम-ए-ग़म की कसम” या “शिकवा तेरा मैं गाऊँ” जैसे अनगिनत उदाहरण दिये जा सकते हैं।

रफ़ी, मन्ना दे और लता जैसे दिग्गजों ने अपनी गायन क्षमताओं के जरिये संगीतकारों को इतना अवसर दिया कि वे फ़िल्मी संगीत से मनचाहे तरीके से खेल सके। रफ़ी साहब ने हाई और लो नोट्स पर गायकी के जरिये ऐसे प्रयोग किये जोकि आज भी विस्मित कर देते हैं और अगर नोटिस करें तो आप पायेंगे कि ऐसे प्रयोग ज़्यादातर दर्द भरे गीतों में ही हुए। “आज पुरानी राहों से”, “मोहब्बत ज़िन्दा रहती है”, “चल उड़ जा रे पंछी” या “ऐ मोहब्बत ज़िन्दाबाद”, ऐसे कितने ही दुख भरे गाने हैं जिनको उद्धृत किया जा सकता है।

आजकल की फ़िल्मों में दर्द भरे गीत नदारद हो चुके हैं। कहीं इक्का-दुक्का सुनाई भी पड़ें तो वे भी प्रभावित नहीं कर पाते। मुझे जो आखरी उल्लेखनीय गीत याद आता है, “तन्हाई”, “दिल चाहता है” फ़िल्म से, वह भी नौ-दस साल पुराना हो चला है। वर्तमान में तो एक ट्रेंड चल पड़ा है कि फ़िल्म में एक-दो डांस नम्बर होने चाहिये जोकि डिस्क से लेकर आइ-पॉड तक में बजाए जा सकें। दुख भरे गीत मातम का प्रतीक बन चुके हैं और उन्हें सुनने में एक हिचक और ऊब का भाव आम है। रेडियो की ओर ही अगर देखें तो सभी एफ़ एम चैनलों में हमेशा नाच-गाने टाइप के गीत बजते सुनाई पड़ते हैं और कई बार तो ये गाने इतने क्षणभंगुर होते हैं कि एक महीने बजने के बाद कभी किसी म्युज़िक प्लेयर का मुँह नहीं देख पाते।

अगर आप नियमित रूप से एफ़ एम सुनते हैं तो इन चैनलों के संगीत-ज्ञान के दिवालियेपन पर आंसू बहाने को हो उठेंगे। किसी भी नई फ़िल्म का गाना हिट हुआ तो हर घंटे एक बार उसका प्रसारण लाजिमी है। इधर बंगलौर में एक चैनल है जो इसी दोहराव को मुद्दा बनाकर विज्ञापन देते फिर रहा है “थर्टीन डिफ़रेंट सॉंग्स एवरी आवर”। मगर सुबह बजने वाला गाना शाम को आप फिर बजता हुआ पाएंगे। कोई गाना दोहराया न जाए इसलिये इस चैनल के जॉकी ने पुराने गीतों की ओर रुख किया है। यहां भी आप गौर करेंगे कि ये अतीत में ज़्यादा आगे नहीं जाते। अस्सी के दशक से पीछे जाना एक तरह से निषेध है। अगर जाएं भी तो किशोर या आर डी बर्मन के मस्ती भरे गीत ही चुने जाते हैं जोकि अकसर दो-चार दिनों में दोहराए जाते हैं। इससे पीछे जाएं तो रफ़ी के गाए शम्मी कपूर किस्म के लटकों-झटकों वाले गीत भी सुनाई पड़ जाते हैं यदाकदा मगर किसी भी हालत में एक दर्द भरा गीत नहीं बजाया जाता। दरअसल आजकल रेडियो सैड सांग्स नहीं बजाते, केवल डांस नंबर्स बजाते हैं। मुझे पिछले दिनो दो बार सुबह जल्दी उठकर कहीं जाना पड़ा और गाड़ी चलाते हुए मैं कभी रेडियो भी सुन लेता हूँ। बंगलौर में एकमात्र हिन्दी गीत बजाने वाला चैनल ही अकसर डीफ़ॉल्ट पर मेरे रेडियो पर सेट होता है और दोनो ही बार वही चैनल चल पड़ा। दोनो ही बार समय सुबह छ: से साढ़े छ: का रहा होगा। पहले दिन उस समय जो गीत बज रहा था वह “लैला ओ लैला” था। मैं चकरा गया। कोई भी चैनल अलसबेरे इस तरह के गीत नहीं चलाता। सुबह के समय सभी जगह आपको भक्ति-संगीत ही चलता मिलेगा। मगर दूसरे दिन जो गीत बज रहा था उसने मुझे सोचने को मजबूर किया कि शायद इस तरह के गीत बजाने वाले जॉकी 24x7 काम करने को तैयार रहते हैं मगर भक्ति-संगीत या फिर गंभीर किस्म का संगीत न तो वे खुद सुन सकते हैं और न ही उसकी उन लोगों को कोई जानकारी होती है। दूसरे मौके पर “खलनायक” फ़िल्म का गीत “चोली के पीछे” चल रहा था। इसी फ़िल्म के आसपास बेहद अच्छे संगीत के साथ एक फ़िल्म आई थी “लेकिन”। “चोली के पीछे” बजाने वाला “लेकिन” फ़िल्म का “यारा सीली सीली” भी बजा सकता था। दोनों एक ही दौर की फ़िल्मे हैं और दोनो में से कोई भी गीत आउटडेटेड नहीं हुआ है अभी तक।

आर डी बर्मन और किशोर कुमार की आज भी प्रासंगिकता बरकरार है जबकि रफ़ी, मन्ना दे और यहां तक कि अभी कुछ ही साल पहले गायकी से सन्यास लेने वाली लता भी अपनी प्रासंगिकता खो रहे हैं। तलत, मुकेश और हेमंत कुमार आदि तो धीरे-धीरे लोगों के मानस पटल से उतर चुके हैं। रफ़ी ने अगर रॉक एण्ड रोल नुमा गाने नहीं गाये होते तो वे भी अपनी तमाम ब्रिलियेंस के साथ अतीत में समा चुके होते। आर डी बर्मन क्यों आज ज़्यादा प्रासंगिक हैं और क्यों लोग उनके आगे किसी और संगीतकार को कुछ मानने को तैयार नहीं होते, स्वंय उनके पिता सचिन दा को मिलाकर, जोकि मेरे विचार में संगीत में आर डी से कई ज़्यादा आधुनिक थे? अगर आप गौर करें तो आर डी को उनके रेट्रो संगीत के लिये ज़्यादा पसंद किया जाता है बजाय कि उनके गंभीर किस्म के संगीत के। कितने लोग उनका “आंधी” या “इजाज़त” फ़िल्म का संगीत सुनना पसंद करते हैं या इस तरह के गानों को “आपके कमरे में कोई रहता है” जैसे गानों पर तरजीह देते हैं? गुलज़ार और आर डी के करिश्माई गाने ही कितने लोगों को याद हैं? “नाम गुम जाएगा”, “थोड़ी सी ज़मीं” या “मीठे बोल बोले” जैसे गाने मैनें अरसे से न किसी को गाते सुना है ना बजाते। शायद गुलज़ार साहब को खुद भी इस लीक के गीत लिखने का मौका काफ़ी वक्त से नहीं मिला होगा। ऑडियंस की याद्दाश्त बहुत दूर तक साथ नहीं देती। लोग आज दर्द भरे गीत सुनना-सुनाना नहीं चाहते तो क्या जाने भविष्य में डांस नम्बर्स की जगह ट्रांस नम्बर्स ले लें। एक खास तबके में तो वे दशकों से प्रचलित रहे ही हैं।

बाज़ार और रचनाशीलता की गुंजाइश, दोनो ही देश के सुदूर कोनों से फ़िल्मी संगीत के लिये प्रतिभा को आकर्षित करते आए हैं और यही वजह है कि हमें एक लंबे समय तक फ़िल्मों में संगीत की विविधता और सृजनात्मकता के दर्शन होते रहे। मगर इस समय जो देखने-सुनने में आ रहा है उसे विविधता से भरा हुआ कहने में मुझे हिचक होती है मगर “समथिंग डिफ़रेंट” उसे मैं ज़रूर कह सकता हूँ। कितनी सारी प्रतिभा आज भी दिखाई देती है जो ओरिजिनल है मगर अकसर जड़ से कटी हुई सी लगती है। दूसरी ओर टीवी पर चलते वाले तमाम सिंगिंग कॉम्पिटीशन को ही लीजिये। इसी तरह के एक प्रसिद्ध टीवी प्रोग्राम में सोनू निगम ने जज की हैसियत से यह सवाल उछाला था कि कॉम्पिटीशन में प्रतिस्पर्धी सिर्फ़ आजकल के ही गीत क्यों गाते हैं, उन्हें बहुत पीछे जाकर ज़्यादा कर्णप्रिय मगर कठिन गीत गाने चाहिये। इससे उनकी योग्यता को जज करना ज़्यादा आसान होगा। नब्बे के दशक तक फ़िल्मों के स्वर्णिम युग से गाने उठाकर रियाज़ और प्रतियोगिताएं की जाती थीं। स्वंय सोनू निगम इसी तरह की प्रतियोगिताओं की देन हैं। मगर यह सिलसिला बीते दशक में गायब हो गया। तुरत-फुरत पाई जा सकने वाली सफलता इसका कारण हो सकता है। यदि रफ़ी के गाए “चाहे कोई मुझे जंगली कहे” टीपने से बात बन सकती है तो “मन तरपत हरि दरशन को” कोई क्यों गाए? शायद इसी सुविधाजनक रवैये के चलते तलत महमूद के फ़ॉलोअर्स दिखाई नहीं पड़ते और इसी रवैये के चलते पुराने गायक ऑब्स्लीट होते जा रहे है और साथ ही दुख को स्वर देने वाले गाने भी।

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

फिर सावन रुत की पवन चली

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आज हम एक और कलाकार का आगाज़ यहाँ करना चाहते हैं जोकि कम मशहूर हैं मगर उनकी चंद गज़लें हम दो दोस्तों को बेहद पसंद आयीं थीं और हमनें उनकी कैसेट मिलकर लम्बे अरसे तक तलाश की थीं। दरअसल मुन्नी बेगम मेरे दोस्त ने पहली बार मुझे सुनाई और खुद सुनी थी और एक दिन वह एकमात्र कैसेट टूट गई। जब दूसरी कैसेट ढूँढने निकले तो पता लगा कि Western कैसेट जिसने ये कैसेट भारत में लॉन्च की थी, बंद हो गई थी। यह इंटरनेट के पालने में खेलने के दिन थे और दूरियां विशेष रूप से ज्यादा थीं।

मुन्नी बेगम मुझे अपनी चंद ग़ज़लों के कारण विशेष रूप से प्रिय हैं। एक मित्र ने जब पूछा था कि मुन्नी बेगम की इन ग़ज़लों में मुझे ऐसा क्या दिखता है तो जवाब में मैं कुछ नहीं कह पाया था क्योंकि पसंद का कोई ठीक कारण मुझे समझ नहीं आया और वह निरुत्तरता अब भी बरकरार है। मसलन इसी ग़ज़ल को उदाहरणस्वरूप अगर लें तो ये मुझे बारिश के दिनों में बादलों के नीचे बैठकर सुननी बेहद पसंद है। अब हर बात की तार्किकता सिद्ध की जा सकती तो दुनिया में इतना झमेला ही क्यों होता?





गुरुवार, 14 जनवरी 2010

मास्टर मदन - अबूझ प्रतिभा

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इंटरनेट बड़े काम की चीज़ है। इसपर घर बैठे-बैठे इतने काम हो जाते हैं कि कहीं जाने की ज़रूरत नहीं। इस वजह से बैठे-बैठे कमर दर्द को न्यौता दे बैठा। मगर सुखद पहलू यह है कि इसी की बदौलत दुनिया के सुदूर कोनों पर बैठे कई लोगों से मैं आज संपर्क में हूँ और कई अनदेखे दोस्त भी हैं। इंटरनेट की वजह से ही कई तरह के संगीत से वास्ता भी पड़ा है, जो शायद वैसे मैं कभी देख-सुन नहीं पाता।
इसी की बदौलत आज मेरे पास कई अनमोल-अप्राप्य संगीत है जो शायद वैसे दुनिया की किसी लाइब्रेरी में संग्रहीत नहीं होगा और यदि होगा भी तो मेरी और मेरे जैसे कई लोगों की पहुंच से बाहर ही रहता।

मास्टर मदन के बारे में भी इंटरनेट पर चरते हुए एक दिन पता लगा। यह पता लगना वास्तव में बहुत ही सीमित है। सिर्फ़ उतना ही जान सका जितना विकीपीडिया पर उपलब्ध था। गजब का प्रतिभावान गायक सिर्फ़ 14 बरस की उम्र में चल बसा और इन्होने अपने छोटे से जीवन में सिर्फ़ आठ गीत रिकार्ड करवाए।

पहली बार सुनते हुए मुझे यकायक विश्वास नहीं हुआ कि इस उम्र में कोई गायन में इतना परिपक्व हो सकता है। उदाहरण के लिये ये ठुमरी सुनिये।



सोमवार, 4 जनवरी 2010

तस्वीर तो बन ही गई

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इस ब्लॉग पर हमनें फ़िल्मी संगीत की बात कम ही की है। इसके पीछे को पूर्वाग्रह नहीं है; बस ऐसा मौका पड़ा नहीं सिवाय तलत और रफ़ी साहब की दो पोस्टों के अलावा। पिछले काफ़ी समय से यहां पोस्ट डालने का अंतराल भी बढ़ता रहा है, जिसकी वजह से मेरे पास काफ़ी सारे विचार और पोस्ट के लिये मटीरियल इकट्ठे होते रहे हैं।

तलत और रफ़ी साहब का नाम आया है तो आज उन्हीं की बात की जाये। रफ़ी साहब किसी भी खांचे में फ़िट होने की कुव्वत रखते थे। तलत साहब ने भी लगभग हर तरह के गीत गाए हैं। यकीन न हो तो उनका एक गीत "ओ अरबपति की छोरी" सुनिये। मगर फ़िर भी यह सच है कि कुछ गीत होते थे जिन्हे सुनकर लगता था कि वे बने ही तलत साहब के लिए थे। रफ़ी साहब हालांकि सबकुछ गाने वाले गायक थे मगर कुछ गाने ऐसे थे जिन्हे सुनकर भी यही लगता था कि वे बने ही रफ़ी साहब के लिये थे हालांकि उसके कारण कुछ और होते थे।

बारादरी फ़िल्म का एक गीत है "तसवीर बनाता हूँ तसवीर नहीं बनती" जिसे नौशाद साहब ने संगीत दिया था। इसे तलत साहब ने गाया है हालांकि लगता है रफ़ी साहब के लिए बना है। नौशाद साहब के इस तरह के गाने रफ़ी साहब ने ज़्यादा गाये हैं संभवत: इसी वजह से मेरा यह पूर्वाग्रह बना हो।
दीवाना फ़िल्म का एक गीत है "तसवीर बनाता हूँ तेरी ख़ून-ए-जिगर से"। नौशाद साहब ने इसका भी संगीत दिया था और इसे रफ़ी साहब से गवाया था मगर लगता है जैसे तलत साहब के टिपिकल अंदाज़ पर यह गीत बेहद सूट करता।
संभव है यह सिर्फ़ मुझे ही लगता हो और किसी और को न लगा हो या शायद किसी और ने इस ओर ध्यान न दिया हो। शायद नौशाद साहब ने भी… खैर, ऐसा नहीं हो सकता कि ऐसे क्षमतावान व्यक्ति ने इस बारे में न सोचा हो। उन्होनें ज़रूर कुछ सोचकर ऐसा किया होगा। और फ़िर दोनो ही गीत बेहद खूबसूरत हैं तो मैं यही मानकर खुश रहता हूँ कि नौशाद साहब ने जो सोचा बहुत अच्छा सोचा।

दोनो ही गाने नीचे दिए हैं। ध्यान से सुनियेगा।


पहले "तसवीर बनाता हूँ तसवीर नहीं बनती" तलत महमूद की आवाज़ में





"तसवीर बनाता हूँ तेरी ख़ून-ए-जिगर से" मौ. रफ़ी की आवाज़ में



गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

गुलाब के खिलने तक

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नाना मौस्कुरी का ज़िक्र यहाँ पहले भी हो चुका है और हमनें वादा भी किया था कि अगली बार उनका गाया "White Roses from Athens" aka "Weisse Rosen von Athens" सुनाया जाएगा। यह एक अद्भुत गीत है और बार बार सुनने का मन करता है।

जर्मनी में १९६१ में ग्रीस के बारे में एक डोक्युमेंटरी बनी थी, जिसके लिए नाना ने यह गीत, जो दरअसल एक लोकधुन पर आधारित है, गाया था। जर्मनी में यह गीत बेहद लोकप्रिय हुआ और आज भी वहां यह नाना के नाम का पर्याय है।



सोमवार, 27 अप्रैल 2009

बानू का जाना

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ब्लॉग पर मेरी उपस्थिति ना के बराबर चल रही है और इसी के चलते मुझे बानू के इंतेकाल के बारे में कबाड़खाना पर नज़र दौड़ते हुए काफ़ी देर से पता चला। अजीब ही सी बात है कि पिछली ही पोस्ट से इकबाल बानो का आगाज़ प्रत्येक वाणी पर हुआ था।
जब मैंने उन्हें सुनना शुरू किया तबतक ख़राब तबीयत के चलते वे गाना बंद कर चुकी थीं और अंत तक उनका गाना लगभग बंद ही रहा मगर भला हो तकनीक का, कि उनके बाद भी हम और हमारे बच्चे ऐसे कलाकारों और उनकी रचनाओं से महरूम नहीं रहेंगे। इकबाल बानो को श्रद्धांजलि ग़ालिब की इस ग़ज़ल के साथ।





दिया है दिल अगर उस को, बशर है क्या कहिये
हुआ रक़ीब तो हो, नामाबर है क्या कहिये
ये ज़िद, कि आज न आवे और आये बिन न रहे
क़ज़ा से शिकवा हमें किस क़दर है क्या कहिये
रहे है यूँ गह-ओ-बेगह के कू-ए-दोस्त को अब
अगर न कहिये कि दुश्मन का घर है क्या कहिये
ज़िह-ए-करिश्मा के यूँ दे रखा है हमको फ़रेब
कि बिन कहे ही उन्हें सब ख़बर है क्या कहिये
समझ के करते हैं बाज़ार में वो पुर्सिश-ए-हाल
कि ये कहे कि सर-ए-रहगुज़र है क्या कहिये
तुम्हें नहीं है सर-ए-रिश्ता-ए-वफ़ा का ख़याल
हमारे हाथ में कुछ है, मगर है क्या कहिये
उन्हें सवाल पे ज़ओम-ए-जुनूँ है क्यूँ लड़िये
हमें जवाब से क़तअ-ए-नज़र है क्या कहिये
हसद सज़ा-ए-कमाल-ए-सुख़न है क्या कीजे
सितम, बहा-ए-मतअ-ए-हुनर है क्या कहिये
कहा है किसने कि "ग़ालिब" बुरा नहीं लेकिन
सिवाय इसके कि आशुफ़्तासर है क्या कहिये
 

प्रत्येक वाणी में महाकाव्य... © 2010

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