(नीचे की लाल रंग की बकवाद को आप चाहें तो स्किप कर सकते हैं और अगर चाहें तो सीधे गीत बजाना भी शुरु कर सकते हैं)
पहाड़ भूत की तरह मुझसे चिपके हैं हालांकि 14-15 सालों से सलीके से जाना बंद कर चुका हूँ या शायद जा नहीं पा रहा हूँ। मैं उस बेचारी पीढ़ी से हूँ जिनकी जड़ें पहाड़ों से जुड़ी हैं और जीवन शहरों से इसलिये मैं न तो पहाड़ी रह गया हूँ और न ठीक तरह से शहरी ही बन पाया हूँ।
बचपन में पिताजी टू-इन-वन में पहाड़ी-गढवाली गाने बजाया करते थे तो बहुत चिढ़ होती थी। जब अपने मन का करने की उम्र हुई तो वो सारी कैसेट्स उठाकर संदूक में डाल दीं। बंगलौर आने के बाद पहाड़ जाने के सारे अवसर बंद हो गए तो उन पहाड़ी गीतों की याद आने लगी।
गोपाल बाबू गोस्वामी के गीत खोजने शुरु किये। अभी तक ज़्यादा का जुगाड़ नहीं हो पाया है। खैर। अगर आसान शब्दों में समझना चाहें तो गोपाल बाबू गोस्वामी को आप कुमाऊँ-गढवाल के मोहम्मद रफ़ी समझ सकते हैं। उनके गीत कुमाऊँनी चेतना का हिस्सा बन चुके हैं और लोग उनके गाए गीतों को अकसर कुमाऊँ के लोकगीत ही समझ लेते हैं। उनका गाया "बेड़ु पाको बारो मासा" (जिसका संगीत प्रसिद्ध कलाकार मोहन उप्रेती ने तैयार किया था) कुमाऊँ रेजिमेंट की धुन के रूप में अपनाया गया।
पिताजी बताते हैं कि उत्तरैणी के कौतिक (मेला) में जब वे गाते हुए चलते थे तो हज़ारों लोग उनके पीछे-पीछे गाते चलते थे। इस तथ्य की तस्दीक़ इरफ़ान भाई ने अशोक जी के द्वारा अपनी घुरू%20घुरू%20उज्याव%20है%20गो">एक पोस्ट में भी की है।
बहरहाल सुनें यह गीत। मनीआर्डर अर्थव्यवस्था वाले उत्तराखण्ड में अकसर पति शहरों में या फ़ौज में नौकरी करते हैं और पीछे छोड़ जाते हैं अपना परिवार। विवाह होने पर पत्नी भी गांव में ही छूट जाती है। विरह-दग्ध इन स्त्रियों की मूक पीड़ा को अक्सर पहाड़ी गीतों में स्वर दिया जाता रहा है। गोपाल बाबू ने भी इस विषय पर गीत गाए हैं। यह गीत उसका एक उत्कृष्ट नमूना है। नीचे मैनें गीत के बोल लिख दिये हैं मगर आलस्य और समयाभाव के कारण अनुवाद नहीं कर रहा। मेरी कुमाऊँनी हास्यास्पद पाई जाती है और इस बोली में मेरा हाथ भीषण रूप से तंग है। नीचे लिखे गीत में अनिवार्य रूप से कुछ गलतियाँ होंगी। दोनो ही बातों के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ।
कैले बजै मुरली हो बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूँ मा
चिरी है कलेजी मेरी तू देख मन मा
मुरुली क सोर सुणी हिया भरी ऐगो
को पापी ल मेरो बैणा मन दुखै हैछो
स्वामी परदेसा मेरा उ जरीं लाम मा
कैले बजै मुरली हो बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूँ मा
मेर मैथ की भगवती तू दैणी हजैये
कुशल मंगल म्यारा स्वामी घर लैये
नंगरा निसाड़ा ल्यूँलो देबी मैं तेरा थान मा
कैले बजै मुरली हो बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूँ मा
भूमि का भूमिया देबा धर दिया लाज
पंचनामा देबो तुम सुणी लिया धात
गवै की चरेउ मेरी तुमरी छ हाथ
दगड़ रैया देबो स्वामी का साथ मा
कैले बजै मुरली हो बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूँ मा
