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बुधवार, 5 जून 2013

फिर इलायाराजा और थोड़ा सा सावन

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मानसून ने दक्षिण में अभी दस्तक दी ही है लेकिन केरल और बंगलौर में एक सप्ताह पहले से ही फुहारें पड़ रही हैं - प्री-मानसून बोनान्ज़ा। बंगलौर में जब बादल छाते हैं तो छंटने का नाम नहीं लेते। मानव की करतूतों से बौराया मानसून अगर सुर में रह पाया तो नवंबर तक सूरज की छुट्टी। इस बीच यूहीं परसाई को पढ़ने बैठ गया और "आयी बरखा बहार" और "राम का दुःख और मेरा" जैसे निबंधों पर अटक गया। पिछले बृहस्पत शाम को ताबड़तोड़ बारिश हुई और बंगलौर के निचले इलाकों में पानी भर गया। लोगों के घरों के तालाब हो जाने की तस्वीरें तो हर साल अखबारों में छपती ही हैं लेकिन इस बार यह मानसून के आने से पहले ही हो गया है। उसपर तुर्रा यह कि इस बार मानसून के पिछले कई सालों के रिकार्ड तोड़ने की उम्मीद की जा रही है। यानि जिन घरों में सिर्फ तालाब बना करते थे वहां अब कृष्णा-कावेरी बहेंगीं। जो बाल्टियाँ घर में पानी लाने के लिए इस्तेमाल की जाती थीं वे पानी उलीचने के लिए इस्तेमाल की जायेंगीं।
हमारे देश में कुछ चीज़ें पौराणिकता और आधुनिकता से ऊपर की रही हैं। बरसाती नालों का गृहप्रवेश उन्हीं में से एक है। परसाई ने क्या लिखा था? - "आसमान के और मेरे ह्रदय में एक साथ धड़कन हो रही है। कविता लिखने के लिए व्यर्थ भय की अनुभूति नहीं बुलाता। यह वास्तविक भय है जिसके सामने कविता नहीं लिखी जाती, जान बचाई जाती है। घर में इतना पानी भर जाता है कि कभी सोचता हूँ कि अगर फर्श का न होता, तो इन कमरों में धान बो देता।" 
गरीब का सच आज भी नहीं बदला; वह सावन का लुत्फ़ लेने की बजाय घर से पानी उलीचने में व्यस्त है। ग़रीब तो खैर ग़रीब है, मेरी ही सोसाइटी में जिन लोगों के घर खुले की और हैं वे बारिश के बाद बालकनी में परदे-पोछे निचोड़ते नज़र आते हैं। भारत का मध्यवर्ग दूसरी ही किस्म की ग़रीबी का मारा है - जीरो टाउनशिप प्लानिंग।

खैर जाने दॆजिये। मैं तो मानसून के लिए पलकें बिछाए बैठा हूँ। धरती माँ को पानी मिलेगा तो प्यास मेरी बुझेगी। सावन हर जगह ही हरा होता है लेकिन बंगलौर में मौसम बहुत रोमांटिक हो जाता है और इस मदमस्त ब्लॉगर को समझ नहीं आता कि इस मौसम का लुत्फ़ कैसे उठाया जाए। अलसुबह दफ्तर को निकलो या देर रात घर के लिए मौसम एक सा ही बना रहता है। अब एक हफ्ते से समझ नहीं आ रहा कि किस किस्म का संगीत सुना जाए। बहुत खंगाला फिर भी ऐसा कुछ नहीं मिला तो मूड को साध और उससे भी ज़्यादा संभाल सके। ऐसे दिलकश मौसम में बन्दा छुईमुई किस्म का हो जाता है और मूड संभालने की ज़रुरत ज़्यादा हो जाती है। 
आज दफ्तर में एक मित्र से सिनेमा पर बात होते हुए बात निकली कि भारतीय सिनेमा में इमोशंस का बाज़ार बहुत बड़ा है और कुछ निर्देशकों ने इसे सलीके से भुनाया भी है। होते-होते मुझे मणि रत्नम की 'मौन-रागम' और 'दलपति' फिल्मों की याद हो आई। दलपति फिल्म का पहला दृश्य सिनेमाटोग्राफी और संगीत के लिहाज से गजब का है। सिनेमाटोग्राफी की बात निकली है इसलिए विडिओ लगा रहा हूँ यहाँ। सिनेमाटोग्राफी संतोष सीवान की है और ज़ाहिराना तौर पर संतोष सीवान ने अपना जादू दिखाया है। संगीत इलायाराजा का है और मुझे लगता है मानसून के रहते मैं उन्हीं की गिरफ्त में रहने वाला हूँ। यह गीत जितने बार भी देखता-सुनता हूँ टीस उठने को होती है। 
इत्तेफ़ाकन यह भी बताता चलूँ कि गीत जानकी ने गाया है जिन्होंने अभी महीने भर पहले ही पद्म-भूषण पुरस्कार यह कहकर लौटा दिया था कि दक्षिण भारतीय कलाकारों को सम्मान समय पर नहीं मिलता। इस आवाज़ का मैं फ़ैन हूँ। गीत सुनकर आप अपना मत बना सकते हैं। 




Chinna thai aval thandha rasave
Mulil thondriya chinna rosave
Solava? Araro,
Nam sondagal yar-yaro
Undhan kannil yenthaan niro?

(Chinna thai aval)

Dear one from a young mother
Little rose found among thorns
Shall I tell you, sweet one,
Who are all our kin?
Why are there tears in your eyes?
Paal manam veesum poo mugham
Paarkayil pongum thai manam
Aayiram kalam our varam
Vendhida vandha poocharam
Veyil vidhiyil vaada koodumo
Deival kovilai chendre serumo
Endhan tenare

(Chinna thai aval)

A soft flower like face which smells like milk
Your mother’s heart blooms when she looks upon you
A thousand years, I had one wish (to have my child)
You are [like] string of flowers which is result of my prayers [of thousand years]
Will you wilt out in the sun?
Or make it to the temple?
My river of honey
Solava? Araro,
Nam sondagal yar-yaro
Undhan kannil yenthaan niro?

(Chinna thai aval)
गीत के शब्द और अनुवाद यहाँ से उठाये गए हैं।

शुक्रवार, 29 जून 2012

हवा में सुर

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कुछ वक़्त पहले इलायाराजा की एक अल्बम 'नथिंग बट विंड' हाथ लगी. यह उनकी दूसरी नॉन-फ़िल्मी अल्बम थी जिसे उन्होंने 1988 में कम्पोज़ किया था। इसमें बतौर बांसुरीवादक  हरिप्रसाद चौरसिया का भी सहयोग था और जैसा कि नाम से ही मालूम पड़ता है अल्बम  सुषिर वाद्यों पर आधारित है।

इस अल्बम को सुनते हुए दो चीज़ें एकदम ध्यान आकर्षित करती हैं। किसी भी ट्रैक को सुनते हुए लगता है कि यह किसी फ़िल्म का हिस्सा है और अगर आप इलायाराजा के संगीत से परिचित हैं तो यह अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल नहीं कि यह उनके तरीके का संगीत है। दोनों ही बातों के पीछे शायद कारण यह है कि इलायाराजा ने सभी ट्रैक्स के लिए अपनी किसी न किसी फ़िल्म के गीतों को ही आधार बनाया है।




ज़्यादातर लोगों को अकसर अल्बम का टाइटल ट्रैक 'नथिंग बट विंड' अधिक पसंद आता है पर मुझे 'कोम्पोसर्स ब्रेद' बेहद  प्रिय है। वही साझा कर रहा हूँ।


मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

दक्षिण के छोटे राजा

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इस पोस्ट का इधर लग पाना तकरीबन १०-११ महीनों तक लगातार स्थगित होता रहा. विश्वास कीजिए कि इससे ज़्यादा दिनों तक मैंने कोई पोस्ट टाली नहीं है और इतने लोगों के हाथ-पैर नहीं जोड़े जितने इस पोस्ट के लिए.

इलयाराजा का नाम उत्तर भारत में अपरिचित नहीं हैं. अक्सर दक्षिण भारतीय अपने लिए उत्तर भारत में तब तक जगह नहीं बना पाते, जबतक वे वहां जाकर कुछ काम न करें. बहुत ही कम लोग इस मामले में अपवाद बन पाए हैं. इलयाराजा ऐसे ही हस्तियों में से हैं. फिर भी मुझे पूरा विश्वास है कि आज भी ऐसे कितने ही लोग हैं जिन्होंने इलायाराजा का नाम नहीं सुना है. एक तो मेरे दफ्तर में ही है, जिसे बंगलुरु आए दो महीने ही हुए हैं.

इलायाराजा के गीतों को तकरीबन एक साल पहले सुनना शुरू किया था और तबसे कुछ और नहीं सुना होगा. ऐसा अमूमन मेरे साथ नहीं होता. इसके कारण की चीर-फाड़ करने में भी वक़्त लगेगा. दक्षिण-भारतीय फ़िल्मी संगीत पूरी तरह से भारतीय होने पर भी आपको कुछ अलग महसूस होगा. सुन्दर से सुन्दर गीत में भी कम्पोसिशन में कई बार एक तरह का डिस्कनेक्ट होता है जो शुरुआत में थोड़ा चुभता है बस शुरुआत में ही. इलायाराजा के गीत भी इस मामले में अपवाद नहीं हैं. वे वाद्यों के गुरु हैं और उनके गीतों को ध्यान से सुना जाए तो आप पाएंगे कि एक तो वे वाद्यों से खेलते हैं और दूसरा चाहे कितने ही पश्चिमी वाद्यों का प्रयोग करें, उनके गीत पूरी तरह भारतीय ही रहते हैं.




इलायाराजा के संगीत पर एक से ज्यादा पोस्ट लगाने का इरादा है. शुरुआत ऐसे गीत से की जाए जिससे लोग पूरी तरह अपरिचित नहीं है.
शायद लोग "सदमा" फिल्म नहीं भूले होंगे. यह फिल्म दरअसल तमिल फिल्म "मून्द्रम पिरई" का रीमेक है. इस फिल्म का संगीत इलयाराजा ने ही दिया था. फिल्म का गीत "कन्ने कऴेमाने" बेहद कर्णप्रिय है और येसुदास की आवाज़ ने इस गीत में भोलापन  भर दिया. हिंदी में यह गीत "सुरमई अखियों में..." है.
इस गीत के बारे में बात करते हुए मेरे तमिल मित्र इसके साथ थोड़ा रहस्य जोड़ते रहे हैं. इसे तमिल के कवि और गीतकार कन्नादासन ने लगभग अपनी मृत्युशैया पर लिखा था. यह उनका आखरी गीत था और इस बात का उनको इल्म था. कहा जाता रहा है कि इस गीत में कुछ और भी मतलब छिपा हुआ है जोकि गीत से ज़ाहिर तो होता है मगर मतलब हाथ नहीं आता.

इस पोस्ट को स्थगित करते रहने का कारण यही था. मैं वह मतलब  ढूंढता रहा. मुझे इस गीत का जो अंग्रेजी तर्जुमा मिल पा रहा था, वह बेहद हास्यास्पद था. इस चक्कर में कुछ ऐसे लोगों से भी पूछ बैठा जिनसे शायद नहीं पूछना चाहिए था. ऐसा ही चलता रहा तो शायद अनुवाद की पूंछ पकड़ने की आदत छोड़ ही देनी पड़ेगी.
हाँ, अगर कभी हिंदी अनुवाद हो सका तो लगा दिया जायेगा.



 

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