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सोमवार, 22 दिसंबर 2008

हीरे नी रांझा जोगी हो गया

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ऐसा बिरले ही होता है कि हम यहां पर एक ही कलाकार को छोटे अंतराल पर दोबार लाएं, मगर कैलाश खेर के लिये मैनें अपवाद रख छोड़ा है। वह इसलिये क्योंकि एक कलाकार को या एक तरह के संगीत को भी मैं लगातार ज़्यादा दिनों तक नहीं सुनता, मगर यहां भी अपवाद बन गया है।



पिछले महीने भर से मैं लगातार कैलाश के 10-12 गाने बार-बार सुन रहा हूँ और उनमें से भी दो गाने जो मुझे बेहद पसंद आए: पहला नैहरवा और दूसरा जो नीचे लगा रहा हूँ। नैहरवा मैनें कुछ समय पहले ही यहां लगाया था। यह गीत दरअसल दो-तीन लोकगीतों का घालमेल है और फ़्यूज़न होने के बावजूद मुझे बेहद अच्छा लगा।




बुधवार, 3 दिसंबर 2008

नैहरवा

2टिप्पणियां
मुंबई में जो हुआ उससे दिल तो टूटा ही मगर उससे भी ज़्यादा तकलीफ़ अपने प्यारे नेताओं के ढंग देखकर हुई। मैं राजनीति से इस कदर दूर रहता हूँ कि उस बारे में पढ़ता तक नहीं हूँ, मगर इस मर्तबा पुलिस, एन एस जी और आतंकवादियों के बीच चल रही गोलाबारी के इतर जो देशभर में हमारे नेता गुल खिला रहे थे, उसने मुझे मजबूर किया कि मैं हर खबर पढ़ता रहा, यहां तक कि सिर्फ़ इसी बारे में बात करता रहा और दफ़्तर में काम के दबाव में नेट पर भी लगातार पढ़ता रहा।
ज़ाहिर है, लाखों लोगों ने यही किया और इससे उनकी तकलीफ़ बढ़ी ही। मगर इससे लोगों में एक जुड़ाव मुझे दिखा। इस सबसे जो बेचैनी बढ़ी उसे कम करने के लिये मैनें यूँहीं कैलाश खेर को सुनना शुरु किया और हैरान रह गया कि किस दरजे का गायक हमारे बीच मौजूद है। मैं आजकल का संगीत नहीं सुनता और सुनता भी हूँ तो वह मुझे अपील नहीं करता। मगर जब नैहरवा और कैलाश के गाए कुछ और गीत सुने तो मेरी चौंकने की बारी थी। इस दौरान मैं नैहरवा और वैसा ही कुछ कैलाश द्वारा गाया सुनता रहा। कबीर का लिखा है इसलिये बार बार लगता है कि इसका कोई छोर मुंबई जाकर ज़रूर लगता है। सुनकर देखिये, आपको भी राहत मिलेगी।



 

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