यह गीत कहीं गहरे से उठता है हालाँकि जोशीला और समुदाय में गाया जाने वाला गीत है मगर किशन सिंह पवार की आवाज़ बहुत दूर ले जाती है। कई बार लगता है आप ख़ुद ही वहां कौतिक में लोगों के साथ नाच रहे हैं।पिताजी को जब ये गीत सुनाया तो बेहद खुश हुए। वे लंबे अरसे से इसे सुनना चाह रहे थे और तकरीबन बीस सालों से ये गीत हमारे घर से गायब था। धन्य हो इन्टरनेट-युग!
गाने की रिकार्डिंग थोड़ी ख़राब है मगर निश्चित ही सुने जाने लायक है।
PS: अभी पोस्ट करने के बाद दोबारा गीत को सुना तो लगा पहले वाला मेरा बयान शायद ग़लत है। गीत और किशन सिंह पंवार की आवाज़ जो दूरी मुझे तय करवाती है वह शायद मेरा व्हिम है और मेरी नितांत निजी कल्पना की वजह से ऐसा होता है। मगर यह तय है कि गाना सुनकर नाचने का जी करता है।
गाने की रिकार्डिंग थोड़ी ख़राब है मगर निश्चित ही सुने जाने लायक है।
PS: अभी पोस्ट करने के बाद दोबारा गीत को सुना तो लगा पहले वाला मेरा बयान शायद ग़लत है। गीत और किशन सिंह पंवार की आवाज़ जो दूरी मुझे तय करवाती है वह शायद मेरा व्हिम है और मेरी नितांत निजी कल्पना की वजह से ऐसा होता है। मगर यह तय है कि गाना सुनकर नाचने का जी करता है।
