परसों रफ़ी साहब की पुण्यतिथि थी और कल प्रेमचंद जी का जन्मदिन। अपन तो समंदर के बीच sailing कर रहे थे वरना वक़्त पर दोनों पर कुछ पोस्ट करते। प्रेमचंद जी मेरी कुव्वत से ज़्यादा गंभीर विषय हैं इसलिये देर से ही सही, सिर्फ़ रफ़ी जी पर पोस्ट डालकर फ़ारिग हो रहा हूँ।
रफ़ी साहब को आलोचकों ने ग़ज़ल के लिये अयोग्य कहकर ख़ारिज कर दिया था। संभवत: उन्हें सच में ऐसा लगा हो और यह भी संभव है कि वे इस बात से डरते हों कि रफ़ी साहब ग़ज़ल-जगत पर भी छा जाएंगे। सच जो भी हो, रफ़ी साहब ने ज़्यादा प्रयास नहीं किये इस ओर। तो भी उनकी गायी एक ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद है। वही प्रस्तुत है आज। शमीम जयपुरी जी की ग़ज़ल को ताज अहमद ख़ान जी ने संगीत दिया है।
कितनी राहत है दिल टूट जाने के बाद
ज़िंदगी से मिले मौत आने के बाद
लज़्ज़त-ए-सजदा-ए-संग-ए-दर क्या कहें
होश ही कब रहा सर झुकाने के बाद
क्या हुआ हर मसर्रत अगर छिन गई
आदमी बन गया ग़म उठाने के बाद
रात का माजरा किससे पूछूँ 'शमीम'
क्या बनी बज़्म पर मेरे आने के बाद
रफ़ी साहब को आलोचकों ने ग़ज़ल के लिये अयोग्य कहकर ख़ारिज कर दिया था। संभवत: उन्हें सच में ऐसा लगा हो और यह भी संभव है कि वे इस बात से डरते हों कि रफ़ी साहब ग़ज़ल-जगत पर भी छा जाएंगे। सच जो भी हो, रफ़ी साहब ने ज़्यादा प्रयास नहीं किये इस ओर। तो भी उनकी गायी एक ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद है। वही प्रस्तुत है आज। शमीम जयपुरी जी की ग़ज़ल को ताज अहमद ख़ान जी ने संगीत दिया है।
कितनी राहत है दिल टूट जाने के बाद
ज़िंदगी से मिले मौत आने के बाद
लज़्ज़त-ए-सजदा-ए-संग-ए-दर क्या कहें
होश ही कब रहा सर झुकाने के बाद
क्या हुआ हर मसर्रत अगर छिन गई
आदमी बन गया ग़म उठाने के बाद
रात का माजरा किससे पूछूँ 'शमीम'
क्या बनी बज़्म पर मेरे आने के बाद
