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रविवार, 14 सितंबर 2008

भुला दिया गया एक गीत

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ट्रैफ़िक पर लिखी दूसरी किस्त पर पाठक न मिलने की फ़्रस्टेशन में डूबते-उबरते हुए मैनें संगीत के अपने गोदाम में टटोलना शुरु किया तो फ़िल्मी संगीत के स्वर्णिम युग से ठीक पहले के दौर के गीतों पर नज़र गई।
यह वह युग था जो पारसी थियेटर की सपाट गायकी के प्रभाव से बाहर आकर अपनी पगड़ंडी खोद रहा था और गिरते-पड़ते अपनी दिशा तलाश रहा था। एक ओर पंकज मल्लिक, अनिल बिस्वास, आर सी बोराल, के सी डे आदि संगीत की नई परिभाषाएं गढ़ रहे थे तो दूसरी ओर नौशाद, जी एम दुर्रानी, सज्जाद हुसैन, एस डी बर्मन इत्यादि राजकुमारी, अमीरबाई कर्नाटकी, हुस्न बानो, गीता राय, कानन देवी, तलत और रफ़ी आदि के साथ नये आयाम तलाश रहे थे। ये सभी लोग कोशिश कर रहे थे कि फ़िल्मी संगीत शास्त्रीयता से परिपक्व हो और मैलोडी और हार्मनी में पगा भी हो।
यह जो गीत मैं आज लाया हूँ, उन गीतों में से जान पड़ता है, जिन्होनें निश्चित तौर पर रफ़ीमय स्वर्णिम युग के लिये एक परिपाटी तय की। 1946 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म "1857" में संगीत दिया था सज्जाद हुसैन ने और यह गीत अंजुम पीलीभीती ने लिखा था। गायकों की पहचान मैं नहीं कर सका। शुरु में रिकार्डिंग खराब है और कुछ हल्का भी सुनाई देता है। मगर मैं तो ट्रैफ़िक वाली पोस्ट पर लोगों के न जुटने से त्रस्त हूँ न तो इस ओर ध्यान नहीं दे रहा, आप भी मत दीजिये।

 

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