किसी-किसी के लेखन में अमरत्व का गुण इस कदर होता है कि भुलाए नहीं भूलता। सलीके से हिन्दी के पहले कवि अमीर खुसरो का लिखा कितने बरसों से गाने वालों के लिये इंस्पिरेशन रहा है। अब इस गीत को ही लीजिये। बचपन में जब वो फ़िल्मी गीत सुना था तो उसका मुखड़ा समझ में ही नहीं आया मगर बड़ा कर्णप्रिय लगा।
मेरा मानना है कि गीत अगर अर्थपूर्ण हो तो किसी भी संगीतकार के लिये उसे साध पाना आसान हो जाता है। "छाप तिलक सब छीनी रे" ऐसी ही एक रचना है। कितने ही वर्ज़न सुनाई पड़ते हैं इसके और हर एक एक से बढ़कर एक। अब इसी को लीजिये। मेहनाज़ के बारे में मैं नहीं जानता मगर उन्होनें यह गीत इतना बढ़िया गाया गया है कि एकदम बांध लेता है:
