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शनिवार, 10 जुलाई 2010

घट घट में पंछी बोलता

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कुछ दिनों से ख़ूलियो इग्लेसियास के गाने सुन रहा था जिन्हें अपनी पत्नी के आग्रह पर मैनें उनके मोबाइल पर डाल दिया था। दरअसल अथर्व महाराज को गाने सुनने का अभी से बेहद शौक है। शौक इस हद तक है कि अगर अगर उन्हें सुलाना हो तो मोबाइल पर गाने चलने चाहिये और अगर वे आधी रात को उठ जाएं तो भी तबतक रोते रहते हैं जबतक गाने न चलने लगें। मेरी हमेशा से इच्छा थी कि मेरे बच्चों को संगीत में रुचि रहे मगर इस तरह की रुचि की मैनें कल्पना नहीं की थी। उसपर तुर्रा ये कि अथर्व को अक्सर ढोल-ढमाके वाले गीत पसंद आते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। अथर्व ने ख़ूलियो के गानों को खारिज कर दिया। खैर, संगीत वाइन की तरह होता है, धीरे-धीरे जज़्ब होगा और धीरे-धीरे टेस्ट बनेगा।



मैनें सोचा कि शायद दोस्तों को ख़ूलियो के गाने पसंद आएं और एक गाना पोस्ट करने के लिये छांट लिया मगर तभी किशोरी अमोनकर के कुछ गीतों पर नज़र पड़ी और कबीर के लिखे कुछ भजनों पर नज़र पड़ी जो किशोरी अमोनकर ने ‘साधना’ एलबम में गाये थे। दिन की शुरुआत के लिये ‘घट घट में पंछी बोलता’ से बढ़िया क्या हो सकता है?




रविवार, 24 अगस्त 2008

पंडित भीमसेन जोशी की आवाज़ में एक भजन

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आज भजन पेश करने के पीछे यह औचित्य नहीं कि मैं चार दिन पहले ही पिता बना हूँ (और इसीलिये ग़ायब भी था) इसलिये भक्ति-भावना से भरकर ऐसा कर रहा होऊँ, यह भी नहीं कि मैं भक्त किस्म का प्राणी होऊँ।
कारण मात्र इतना है कि पंडित भीमसेन जोशी का यह मराठी भजन मुझे काफ़ी अपीलिंग लगा और लंबे अरसे से इसे सुनता आ रहा हूँ (बग़ैर समझे)। एक मराठी सहकर्मी से जब अर्थ की बाबत पूछा तो उसका जवाब और भी ज़्यादा उलझाने वाला था। उसके अनुसार इसमें श्रीराम के वनवास के बारे में कहा गया है। "क्या कहा गया है?" मैंने पूछा तो उसका जवाब था, "उनके वनवास के बारे में।"
"अरे वनवास के बारे में बताया जा रहा है।" उसने कहा।
मैंने पूछा, "वही तो। क्या बताया जा रहा है?"
"वनवास के बारे में।" उसके जवाब में कोई फेरबदल नहीं हुआ तो मुझे लगा पूछना व्यर्थ है। मतलब तो मुझे आज भी नहीं मालूम।
किस राग पर आधारित है या बंदिश कौनसी है इसका भी मैं पता नहीं लगा पाया। सच तो यह है कि जब पहली बार सुना था तो पता ही नहीं था कि भजन है मगर बंध गया था सुनकर। इसलिये मैं अपने को परे सरकाकर भजन को आगे कर देता हूँ। बस इतना और कि भजन समर्थ रामदास का है और संगीत राम फाटक का।



आरंभी वंदीन अयोध्येचा राजा ।
भक्ताचीया काजा पावत असे ॥१॥

पावत असे महासंकटी निर्वाणी ।
रामनाम वाणी उच्चारीत ॥२॥

उच्चारिता राम होय पाप चर ।
पुण्याचा निश्चय पुण्यभूमी ॥३॥

पुण्यभूमी पुण्यवंतासीं आठवे ।
पापीयानाठवे काही केल्या ॥४॥

काही केल्या तुझे मन पालटेना ।
दास म्हणे जन सावधान ॥५॥
 

प्रत्येक वाणी में महाकाव्य... © 2010

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