रविवार, 30 जनवरी 2011

एक कर्णप्रिय कन्नड़ गीत

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सन 2006 में एक कन्न्नड़ फ़िल्म रिलीज़ होती है, जिसके भविष्य के बारे में कोई आश्वस्त नहीं है। कारण? लगभग अनजान दिगदर्शक और उससे भी ज़्यादा अनजान नायक। फ़िल्म सिनेमा हॉल्स में आती है और जैसाकि कई फ़िल्मों के साथ हुआ है, रफ़्तार पकड़ती है और 90 लाख की लागत की फ़िल्म 76 करोड़ कमा लेती है; कन्नड़ सिनेमा के इतिहास में अभी तक का रिकार्ड। शायद यह गणित कई लोगों के पल्ले न पड़े मगर दक्षिण भारत में फ़िल्मों के लिये अद्भुत पागलपन होने के बावजूद कन्नड़ फ़िल्में अपने लिये अपेक्षित जगह नहीं बना सकी हैं। वे आज भी तमिल, तेलुगु और मलयालम फ़िल्मों के सामने दूसरे दरजे की ही ठहरती हैं। कर्नाटक में ही अन्य द्रविड़ भाषाओं की फ़िल्में ज़्यादा चलती हैं।



यह जो फ़िल्म है मुंगारु मलये या मुंगारु मड़ये न सिर्फ़ रिकार्ड बनाती है बल्कि कन्नड़ फ़िल्मों को एक दिशा भी देती है और एक तरह से कन्नड़ सिनेमा के लिये सर्वाइवल किट की तरह भी काम करती है। यह फ़िल्म नायक गणेश और दिग्दर्शक योगराज को कन्नड़ फ़िल्म इन्डस्ट्री की पहली कतार में खड़ा कर देती है। इस फ़िल्म की सफलता का बहुत बड़ा कारण इसका संगीत था। इस फ़िल्म के गाने पहले कन्नड़ गाने थे जो मैंने और कई उत्तर भारतीयों ने नोटिस किये; अद्भुत ताज़गी से भरे और बेहद कर्णप्रिय। आवाज़ जानी पहचानी लगी। फिर पता चला दो गीत सोनू निगम ने गाए हैं जोकि सबसे अधिक मक़बूल हुए। बाकी गीत भी प्रसिद्ध हुए हैं। सोनू निगम का नाम सुनकर हैरान न हों क्योंकि सिर्फ़ वही नहीं, हिन्दी पट्टी के कई और गायक इस ओर बहुत गीत गाते हैं। वैसे सोनू निगम का गाया अगर मुझे आजतक कुछ पसंद आया है तो वह इसी फ़िल्म के गीत हैं।
बहरहाल इस फ़िल्म का टाइटल ट्रैक मुंगारु मड़ये बाकी गीतों से ज़्यादा मशहूर हुआ है। वही सुना जाए आज।

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अपने और आपके सुभीते के लिये मैनें नीचे गीत के बोल रोमन में लिख दिये हैं और उनका तर्जुमा हिन्दी में भी कर दिया है।

Mungaru Maleye
ओह सावन की पहली बारिश
Yenu ninna Hanigala Leele
तेरी बूँदों ने क्या जादू कर दिया

Ninna Mugila Saale, Dhareya Korala Premada Maale
तूने आकाश में ऐसे लकीर खींची, लगता है जैसे धरती के गले में प्रेम की माला
Suriva Olume Aajadi Malege, Preeti Moodide
झमझमाती बारिश के निर्झर बोध में प्रेम उमड़ रहा है
Yaava Chippinalli, Yaava Haniyu Muttaguvudo
जाने किस बूँद की सीप से मोती निकल आए
Olavu Yelli Kudiyoduvudo, Tiliyadagide
प्यार की कली कहाँ खिले मेरी समझ से परे है
Mungaru Maleye..
ओह सावन की पहली बारिश
Yenu ninna Hanigala Leele
तेरी बूँदों ने क्या जादू कर दिया

Bhuvi Kenne Tumba, Mugilu Surida Muttina Gurutu
जिस तरह आसमान पानी की बूँदें बरसा रहा है, धरती के गाल मोतियों के निशान से भर गये हैं
Nanna Yedeya Tumba, Avalu Banda Heggeya Gurutu
मेरा मन उसके आने की उत्सुकता से भरा हुआ है
Hegge Gegge Aa Savi Saddu, Premanadavoo
उसके पैरों की मीठी आमद, प्रेम की लय
Yede Mugilinalli, Rangu challi Nintalu Avalu
मेरे हृदय के आकाश में उसने रंग भर दिया है और वहाँ खड़ी है
Baredu Hesaru Kamanabillu, Yenu Modeyoo
उसका नाम लिखा है जैसे इन्द्रधनुष, आह कैसी बौछार है
Mungaru Maleye..
ओह सावन की पहली बारिश
Yenu ninna Hanigala Leele
तेरी बूँदों ने क्या जादू कर दिया


Yava Hanigalinda, Yava Nelavu Hasiraguvudo
किस बूँद से धरती का कौनसा हिस्सा हरा होगा
Yaara Sparshadindaa, Yara Manavu Hasivaguvudo..
किसके स्पर्श से किसकी आत्मा में प्रेम के अंकुर पनपेंगे
Yara Usirali Yara Hesaro Yaru Baredaro
किसकी साँसों में किसने किसका नाम लिख डाला है
Yava Preeti Huvu, Yara Hrudayadalli Ararluvudo
किसके प्रेम की कोंपल किसके हृदय में फूटेगी
Yaara Prema Poojege Mudipo, Yaru Balloro
किसका प्यार पूज्नीय है, कौन समझ सका है?
Mungaru Maleye..
ओह सावन की पहली बारिश
Yenu ninna Hanigala Leele
तेरी बूँदों ने क्या जादू कर दिया


Olava Chandamama Naguta Banda Manadangalake
खूबसूरत चाँद मेरे ज़ेहन में घूम गया
Preeti Belakinalli, Hrudaya Horatide Meravanige
प्रेम की रोशनी से दीप्त मेरा प्रेम एक यात्रा पर निकल पड़ा है
Avala Prema Doorinakadege, Preeti Payanavoo
उसकी प्रेम नगरी की ओर, प्रेम की यात्रा पर
Pranaya Doorinalli, Kaledu Hogo Sukava Indu
कुछ देर के लिये सुख तुम चले जाओ प्रेम नगरी से
Dhanyanaade Padedukondu Hosa Janmavoo
मैं एहसानमंद हूँ कि मुझे यह नया जन्म मिला
Mungaru Maleye..
ओह सावन की पहली बारिश
Yenu ninna Hanigala Leele
तेरी बूँदों ने क्या जादू कर दिया

सोमवार, 24 जनवरी 2011

जाऊँ मैं तोरे बलिहारी - पंडित भीमसेन जोशी को श्रद्धांजलि

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दो-दिन पहले पिछली पोस्ट लगाते हुए मालूम नहीं था कि इतनी जल्दी फिर एक पोस्ट लिखने बैठूँगा। यह उम्मीद तो कतई नहीं थी कि दु:ख के साथ ब्लॉग पर आना होगा। सुबह-सुबह अखबार में सबसे पहले पंडित भीमसेन जोशी जी के देहांत की खबर पर नज़र पड़ी। दिनभर टीवी पर उनके स्वर्गवास की खबर फ़्लैश होती रही। सभी ने कहा यह दु:खद समाचार है; एक युग का अंत है।
निश्चित ही एक युग का अंत है। मुझ जैसों के लिए तो इस युग से पहले शून्य था, बाद में भी शायद शून्य ही रहेगा। पं भीमसेन जोशी, पं जसराज, कुमार गंधर्व, सुब्बुलक्ष्मी, पं छन्नूलाल मिश्रा जैसे नामों ने इस युग को गढ़ा था, इनके साथ ही शायद इस युग का अंत हो जाए। पंडित जी ने कबीर को कितना गाया था, कितना मराठी में गाया था। सब अच्छा लगता था। इससे पहले एक ही बार उनका गाया यहां पोस्ट करने का इत्तेफ़ाक़ हुआ था। जब शास्त्रीय संगीत से गजभर की दूरी रखता था तब भी कही पंडित जी की आवाज़ में कोई भजन गाहे-बगाहे सुनाई दे जाता तो झट से उनकी आवाज़ को पहचानने की कोशिश करता जैसे अपने प्रिय फ़िल्मी गायकों की आवाज़ को पहचानता था।
देह नहीं है, आवाज़ तो रहेगी। पंडित जी की राग वृंदावनी सारंग में गाई यह रचना बहुत पसंद की जाती रही है और मुझे भी बेहद भाती है। श्रद्धांजली के रूप में वही पोस्ट कर रहा हूँ।

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शनिवार, 22 जनवरी 2011

न्यौली और जोड़

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"कट्न्या-कट्न्या पौलि ऊँछौ चौमास कौ बन
बग्न्या पाणी थामी जांछौ नी थामीनौ मन"

ये पंक्तियां मुझे एकाधिक कुमाऊँनी गीतों/लोकगीतों में सुनाई दीं और मुझे यह जानकर हैरानी भी हुई और सुख भी कि लोकगीत कितनी सफलता से काव्यात्मक भी रहे हैं। इन पंक्तियों का अर्थ है कुछ यूँ है:

"बार बार कटते रहने पर भी चतुर्मास का वन फिर फिर पनप जाता है,
बहता पानी तो थम जाता है मगर मन नहीं थमता"

ऊपर लिखी पंक्तियां जोड़ कहलाती हैं। जोड़ में पहली और दूसरी पंक्ति में अकसर कोई परस्पर संबंध नहीं होता। यह आप अनुवाद पढ़कर समझ ही गए होंगे। उत्तराखण्डी लोकगीतों में जोड़ डालने की परंपरा है। जहां तक मेरी जानकारी है जोड़ डालने की परंपरा न्यौली गीतों में रही है जोकि मूलत: विरहगीत होते हैं। लोग जब लकड़ी काटने जंगलों में जाया करते थे तो न्यौली गाई जाती थी। एक ओर एक ने कोई जोड़ डाला तो प्रत्युतर में दूसरी ओर से कोई और जोड़ डालता था। ऐसा नहीं कि जोड़ पुराने ही दोहराए जाते थे। अकसर तात्कालिक रचे जाते। मनोरंजन और अभिव्यक्ति की यह परंपरा किसी ज़माने में बहुत समृद्ध रही होगी। मगर अब सब बहुत तेजी से बिसराया जा रहा है। अज्ञेय की कविता कुछ यूँ थी…

"जहां तक दीठ जाती है
फैली हैं नंगी तलैटियाँ
एक-एक कर सूख गए हैं
नाले, नौले और सोते
कुछ भूख, कुछ अज्ञान, कुछ लोभ में
अपनी संपदा हम रहे हैं खोते
ज़िदंगी में जो रहा नहीं, याद उसकी
बिसूरते लोकगीतों में
कहां तक रहेंगे संजोते?"

मैं अज्ञेय से इत्तेफ़ाक़ न रखते हुए एक कुमाऊँनी गीत यहां लगा रहा हूँ। पुरूष स्वर गोपालबाबू गोस्वामी जी का है। महिला गायक कौन हैं मुझे पता नहीं। मतलब के पीछे ज़्यादा न भागें। इतना जान लेना पर्याप्त होगा कि पति अपनी पत्नी से कह रहा है कि उसे छोड़कर मायके न जाए।

पुनश्चः: यह गीत न्यौली नहीं है और न ही इसमें जोड़ हैं।


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