सोमवार, 24 जनवरी 2011

जाऊँ मैं तोरे बलिहारी - पंडित भीमसेन जोशी को श्रद्धांजलि



दो-दिन पहले पिछली पोस्ट लगाते हुए मालूम नहीं था कि इतनी जल्दी फिर एक पोस्ट लिखने बैठूँगा। यह उम्मीद तो कतई नहीं थी कि दु:ख के साथ ब्लॉग पर आना होगा। सुबह-सुबह अखबार में सबसे पहले पंडित भीमसेन जोशी जी के देहांत की खबर पर नज़र पड़ी। दिनभर टीवी पर उनके स्वर्गवास की खबर फ़्लैश होती रही। सभी ने कहा यह दु:खद समाचार है; एक युग का अंत है।
निश्चित ही एक युग का अंत है। मुझ जैसों के लिए तो इस युग से पहले शून्य था, बाद में भी शायद शून्य ही रहेगा। पं भीमसेन जोशी, पं जसराज, कुमार गंधर्व, सुब्बुलक्ष्मी, पं छन्नूलाल मिश्रा जैसे नामों ने इस युग को गढ़ा था, इनके साथ ही शायद इस युग का अंत हो जाए। पंडित जी ने कबीर को कितना गाया था, कितना मराठी में गाया था। सब अच्छा लगता था। इससे पहले एक ही बार उनका गाया यहां पोस्ट करने का इत्तेफ़ाक़ हुआ था। जब शास्त्रीय संगीत से गजभर की दूरी रखता था तब भी कही पंडित जी की आवाज़ में कोई भजन गाहे-बगाहे सुनाई दे जाता तो झट से उनकी आवाज़ को पहचानने की कोशिश करता जैसे अपने प्रिय फ़िल्मी गायकों की आवाज़ को पहचानता था।
देह नहीं है, आवाज़ तो रहेगी। पंडित जी की राग वृंदावनी सारंग में गाई यह रचना बहुत पसंद की जाती रही है और मुझे भी बेहद भाती है। श्रद्धांजली के रूप में वही पोस्ट कर रहा हूँ।

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