मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

याद पिया की आए…

ठुमरी से मेरी पहली मुठभेड़ तकरीबन-तकरीबन कॉलेज जाने की उम्र में हुई थी, प्रहार फिल्म के ज़रिये। उस समय और उसके बाद के कुछ सालों तक ठुमरी या और किसी उपशास्त्रीय संगीत से कोई ख़ास साबका नहीं पड़ा। उस दौर में फ़िल्मी संगीत इस हद तक स्तरहीन हो चुका था कि उसके और घटिया होने की गुँजाइश नहीं बची थी। हम दोस्त पुराने फ़िल्मी गीत सुनते थे और वहाँ से होते हुए पुराने ग़ैर-फ़िल्मी संगीत की ओर मुड़े। फिर उधर से ग़ज़लों की ओर। इतना परिपक्व होने में भी कई साल लग गए कि शास्त्रीय संगीत की ओर रुख़ करते। ऐसे समय में यदा-कदा कोई ऐसी चीज़ सुनाई दे जाती कि यकीन होता शास्त्रीय संगीत से परहेज़ की या डरने की कोई वजह नहीं।

बात प्रहार फ़िल्म की हो रही थी, जिसमें शोभा गुर्टू जी की गाई ठुमरी 'याद पिया की आए' सुनी थी। आज कई दिनों बाद आइपॉड पर ठुमरी सुनने बैठा तो शफ़ल मोड पर यही ठुमरी गुर्टू जी की आवाज़ में चलने लगी। उसके ठीक बाद फिर से यही ठुमरी बड़े गुलाम अली साहब की आवाज़ में भी चल पड़ी।

तकनीक बहुत बड़ी नेमत है इसका ख़याल मुझे बार-बार संगीत के दिग्गजों को सुनते हुए होता है, जो अब हमारे बीच नहीं हैं या जिन्हे लाइव सुनने का इत्तेफ़ाक़ अभी हुआ नहीं है। आज भी जब यही ठुमरी ऐसे मूर्धन्य गायकों की आवाज़ में एक के बाद एक सुनने को मिली तो वैसा ही महसूस हुआ। तो ब्लॉग पर आज क्यों न दोनों ही आवाज़ों में यही ठुमरी लगाई जाए?



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3 टिप्पणियां:

Lalit ने कहा…

Yaar mahen, tumhara yah pahalu aaj pahali baar dekha, natmastak hoon main tumhare saamane... bahut kuchh sikhaa gaye tum... saadar

Lalit ने कहा…

Yaar mahen, tumhara yah pahalu aaj pahali baar dekha, natmastak hoon main tumhare saamane... bahut kuchh sikhaa gaye tum... saadar

दर्शन लाल बवेजा ने कहा…

वाह जनाब ....
खुशी हुई आपसे मिल कर,
हमे भी शौंक है |
आभार

 

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