सोमवार, 4 जनवरी 2010

तस्वीर तो बन ही गई

इस ब्लॉग पर हमनें फ़िल्मी संगीत की बात कम ही की है। इसके पीछे को पूर्वाग्रह नहीं है; बस ऐसा मौका पड़ा नहीं सिवाय तलत और रफ़ी साहब की दो पोस्टों के अलावा। पिछले काफ़ी समय से यहां पोस्ट डालने का अंतराल भी बढ़ता रहा है, जिसकी वजह से मेरे पास काफ़ी सारे विचार और पोस्ट के लिये मटीरियल इकट्ठे होते रहे हैं।

तलत और रफ़ी साहब का नाम आया है तो आज उन्हीं की बात की जाये। रफ़ी साहब किसी भी खांचे में फ़िट होने की कुव्वत रखते थे। तलत साहब ने भी लगभग हर तरह के गीत गाए हैं। यकीन न हो तो उनका एक गीत "ओ अरबपति की छोरी" सुनिये। मगर फ़िर भी यह सच है कि कुछ गीत होते थे जिन्हे सुनकर लगता था कि वे बने ही तलत साहब के लिए थे। रफ़ी साहब हालांकि सबकुछ गाने वाले गायक थे मगर कुछ गाने ऐसे थे जिन्हे सुनकर भी यही लगता था कि वे बने ही रफ़ी साहब के लिये थे हालांकि उसके कारण कुछ और होते थे।

बारादरी फ़िल्म का एक गीत है "तसवीर बनाता हूँ तसवीर नहीं बनती" जिसे नौशाद साहब ने संगीत दिया था। इसे तलत साहब ने गाया है हालांकि लगता है रफ़ी साहब के लिए बना है। नौशाद साहब के इस तरह के गाने रफ़ी साहब ने ज़्यादा गाये हैं संभवत: इसी वजह से मेरा यह पूर्वाग्रह बना हो।
दीवाना फ़िल्म का एक गीत है "तसवीर बनाता हूँ तेरी ख़ून-ए-जिगर से"। नौशाद साहब ने इसका भी संगीत दिया था और इसे रफ़ी साहब से गवाया था मगर लगता है जैसे तलत साहब के टिपिकल अंदाज़ पर यह गीत बेहद सूट करता।
संभव है यह सिर्फ़ मुझे ही लगता हो और किसी और को न लगा हो या शायद किसी और ने इस ओर ध्यान न दिया हो। शायद नौशाद साहब ने भी… खैर, ऐसा नहीं हो सकता कि ऐसे क्षमतावान व्यक्ति ने इस बारे में न सोचा हो। उन्होनें ज़रूर कुछ सोचकर ऐसा किया होगा। और फ़िर दोनो ही गीत बेहद खूबसूरत हैं तो मैं यही मानकर खुश रहता हूँ कि नौशाद साहब ने जो सोचा बहुत अच्छा सोचा।

दोनो ही गाने नीचे दिए हैं। ध्यान से सुनियेगा।


पहले "तसवीर बनाता हूँ तसवीर नहीं बनती" तलत महमूद की आवाज़ में


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"तसवीर बनाता हूँ तेरी ख़ून-ए-जिगर से" मौ. रफ़ी की आवाज़ में


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5 टिप्पणियां:

vikas zutshi ने कहा…

sir music player nazar he nhi aa rha
vikaszutshisn.blogspot.com
likhoapnavichar.blogspot.com

महेन ने कहा…

विकास भाई, इधर तो दिख रहा है और चल भी रहा है। फिर कोशिश कर देखिये।

अमिताभ मीत ने कहा…

Gerat songs both boss.दफ्तर से निजात पा कर फ़ुर्सत में सुनूंगा ... तलत और रफ़ी कौन क़ायल नहीं होगा ? मैं तो कमसकम एक मुद्दत से हूँ. कभी फ़ुर्सत में हों तो ये सुनिए ...

http://kisseykahen.blogspot.com/2009/11/blog-post_12.html

vimal verma ने कहा…

बहुत उम्दा महेनजी, मुझे तो प्लेयर भी दिख रहा है और तबियत से सुन भी रहा हूँ....पोस्ट अच्छी लिखी है आपने..बहुत से गाने ऐसे हैं जैसे लगता है इन्हीं के लिये लिखा गया हो..बात में दम है! लिखते रहें सुनाते रहें .....नव वर्ष मंगल हो!!!

sidheshwer ने कहा…

बार - बार सुनी रचनायें
बार - बार सुनी जने लायक रचनायें!
क्या कहूँ
शुक्रिया दिल से

 

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