मंगलवार, 13 जनवरी 2009

मेरी बओ सुरीला

यह गीत कहीं गहरे से उठता है हालाँकि जोशीला और समुदाय में गाया जाने वाला गीत है मगर किशन सिंह पवार की आवाज़ बहुत दूर ले जाती है। कई बार लगता है आप ख़ुद ही वहां कौतिक में लोगों के साथ नाच रहे हैं।पिताजी को जब ये गीत सुनाया तो बेहद खुश हुए। वे लंबे अरसे से इसे सुनना चाह रहे थे और तकरीबन बीस सालों से ये गीत हमारे घर से गायब था। धन्य हो इन्टरनेट-युग!
गाने की रिकार्डिंग थोड़ी ख़राब है मगर निश्चित ही सुने जाने लायक है।






PS: अभी पोस्ट करने के बाद दोबारा गीत को सुना तो लगा पहले वाला मेरा बयान शायद ग़लत है। गीत और किशन सिंह पंवार की आवाज़ जो दूरी मुझे तय करवाती है वह शायद मेरा व्हिम है और मेरी नितांत निजी कल्पना की वजह से ऐसा होता है। मगर यह तय है कि गाना सुनकर नाचने का जी करता है।

3 टिप्पणियां:

Tarun ने कहा…

बहुत मधुर मजा आ गया सुनकर, लगा कि वहीं पहुँच गया हूँ

Mired Mirage ने कहा…

बहुत आनन्द आया सुनकर। दो गीत सुनना चाहती हूँ।
१. नैनीताला धोबीघाटा कुटुर पाणी पीण सिटौल।
२ घूर घुघूती घूर घूर, मैत की नौराई लागी मैत मेरो दूर।
घुघूती बासूती

महेन ने कहा…

घुघूती जी ये दोनों गीत ढूँढने पड़ेंगे.. मुझ गरीब पहाड़ी के पास तो नहीं हैं फिलहाल. मिलते ही आपके हुक्म की तामील की जायेगी.

 

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