गुरुवार, 5 जून 2008

फैशन बलात्कार और कुंठा

एक ब्लोग पर टिप्पणियों के आकार के दो लेख फैशन और महिलाओं पर पढ़े और साथ ही पाठकों की टिप्पणियां भी पढीं। मेरे विचार इस बारे में कुछ प्रगतिशील हैं मगर फैशन को व्यवसाय की हद तक देखना सही नहीं समझता। जो लोग यह कहते हैं कि लड़कियों को कम फैशन करना चाहिए वे लोग ज़रूर सामने से गुज़रती हुई लड़कियों की छाती को टकटकी लगाये देखते होंगे इसमे कोई कोई दो राय नहीं होनी चाहिए। अगर वे ऐसा ना भी करते हों तो भी इतना तो ज़रूर है की उनके स्वंय के मन में नारी को लेकर या यूं कहें कि सेक्स को लेकर कई तरह की कुंठायें होंगीं जो बाहर नहीं आ पातीं या वे इतने भीरू हैं कि इस बात को खुलकर स्वीकार नहीं कर पाते और अपनी कुंठायें महिलाओं कि ओर बढ़ा देते हैं। बलात्कार वास्तव में अपनी कुंठा महिला की ओर बढ़ाना नहीं तो और क्या है?

पहले बात करें फैशन की। फैशन के विभिन्न आयाम हो सकते हैं। मतलब फैशन की बात किस सन्दर्भ में हो रही है। रितु कुमार यदि एक एक्सक्लूसिव और डिजाइनर सलवार-कुरता बाज़ार में लेकर आती है जो कि भारतीय मानसिकता पर खरा उतरता है तो भी वह फैशन ही कहलायेगा और यदि य्वेस सें लौरें कोई बिकनी बाज़ार में लाते हैं तो भी वह फैशन ही कहलायेगा। असल बात है कि ये तथाकथिक लोग किस फैशन कि बात कर रहे हैं? साफ शब्दों में कहें तो वे कहना चाहते हैं कि चूँकि लड़कियां अपना अंग उघाड़ती हैं इसीलिए उनके साथ ऐसा व्यवहार होता है। मगर क्या इसमें रंचमात्र भी सच्चाई है? फैशन के सन्दर्भ में भारत का पेरिस कहे जाने वाले बंगलोर में दिल्ली के मुकाबले कम बलात्कार क्यों होते हैं? मुम्बई महिलाओं के लिए दिल्ली की अपेक्षा इतना सुरक्षित क्यों है? और क्या बलात्कार का अगर फैशन से कोई सम्बन्ध है तो छोटे छोटे गावों में बलात्कार क्यों होते हैं? क्या वहाँ ज़्यादा फैशन किया जाता है? क्या बलात्कार उन्ही लड़कियों के साथ होता है जो ज़्यादा “फैशन” करती हैं? वास्तव में किसी को फैशन करने से मना करना तो कुछ यूं कहने जैसा है कि हम अपने आपको रोक नहीं सकते इसलिए बेहतरी इसी में है कि आप अपने आप को रोक लो कुछ भी ऐसा करने से जिससे हमारे सब्र का बाँध टूट जाए।

बलात्कार और महिलाओं की ओर बढ़ते हिंसक रवैये की कई वजहें हो सकती हैं। सहनशीलता का अभाव और सामाजिक परिवेश में बदलाव इसके दो प्रमुख कारण हो सकते हैं।पहले सहनशीलता के अभाव की बात करें। जैसा कि हरिवंश राय बच्चन ने कहा था कि "पहले लोग आपपर हँसते हैं, फिर आपका विरोध करते हैं और अंततः आपको स्वीकार कर लेते हैं।" यह बात कमोबेश फैशन पर भी लागू होती है। जब १९४६ में फ्रांस के लुईस रेअर्द और जक्क़ुएस् हेइम ने बिकनी बाज़ार में पेश की तो उसका खुलकर विरोध हुआ। स्पेन, पुर्तगाल और इटली में इसपर आनन-फानन में प्रतिबन्ध लगा दिया गया। लोग दुविधा में थे इस तथाकथिक कपड़े के टुकड़े को लेकर। मगर इस टुकड़े ने फैशन को नया आयाम दिया। बिकनी का विरोध अगले कम से कम १५ सालों तक जारी रहा जब "modern girl" पत्रिका ने लिखा, "तथाकथित बिकनी पर शब्द खर्च करना कतई बेमानी है क्यूंकि यह तथ्य कल्पना से परे है कि कोई भी व्यवहार-कुशल और शालीन लड़की कभी इसे पहनेगी।“ बहुत ही खुला हुआ समाज कहे जाने वाले अमेरिका में तो इसका विरोध और भी बाद तक जारी रहा। मगर अंततः इसे अपना लिया गया। और आलम यह है कि योरोपे या अमेरिका में यदि कोई लड़की आपको बिकनी में दिखाई देती है तो भी आप उसकी ओर ललचाई नज़रों से नहीं देखते क्योंकि यह इतनी साधारण सी बात है। मगर हमारे यहाँ लोग आंखों की बजाये एक्सरे-मशीन लगाकर चलते हैं और कपडों के भीतर भी सबकुछ देख लेना चाहते हैं।

कोई यह न कहे कि बिकनी की बात करना कतई बेमानी है भारतीय सन्दर्भ में, क्योंकि प्राचीन भारत में हमारी स्त्रियाँ जो कंचुकी पहनतीं थीं वह बिकनी के उपरी हिस्से सरीखा ही होता था। भारतीय साड़ी जिसमें पेट प्रदर्शन ज़ाहिर है और हमें बिल्कुल सामान्य लगता है उसे युरोपे कि महिलाएं बहुत आश्चर्य से देखती हैं क्योंकि वहाँ पर पेट दिखाना सेक्सी दिखने का प्रयास माना जाता है। कुल-जमा बात है सोच की। क्या आज से हजार साल पहले हमारे यहाँ पर्दा-प्रथा होती थी? क्या वसंतोत्सव के त्यौहार पर युगल नहीं बनते थे? क्या उस समय हमारी स्त्रियों के परिधान में अंग-प्रदर्शन आज से ज्यादा नहीं था? बिकनी सरीखे कपडों का प्रचलन आज से १७०० साल पहले ज्ञात है। एक ओर लोग प्रगतिशीलता की बात करते हैं और दूसरी ओर बदलाव से इस कदर घबराते हैं कि बगैर सोचे-समझे हर चीज़ के विरोध पर आमादा हो जाते हैं।

एक हिन्दुस्तानी सज्जन एक बार जर्मनी में अपने मित्र के साथ घूम रहे थे। उन्होंने देखा कि एक युगल पार्क के किनारे बेंच पर तनोरंजन में संलग्न हैं। वे कुछ देर टकटकी लगाये हुए उधर देखते रहे फिर एकदम से बोले, "छी! कितना सेक्स भरा है इनके मन में।" उनके मित्र बोले, "सेक्स उनके नहीं, आपके मन में भरा हुआ है, तभी तो आप असहज हो रहे हैं।" अथार्थ उनके मन में कुंठा थी और प्रेमी युगल बिल्कुल सहज थे। यहाँ ओशो को उद्धृत करना भी संभवतः ग़लत नहीं होगा। "धर्म ने सेक्स को ज़हर देकर मारना चाहा। सेक्स मरा नहीं, ज़िन्दा रहा और अब वह ज़िन्दा भी है और ज़हरीला भी।" अगर हम भारत कि ओर देखें तो हमारे यहाँ दुविधा यह है कि हम किसी भी ऐसी चीज़ को जो महिलाओं से संबंधित हो आसानी से अपना नहीं सकते। यहाँ मैं सिर्फ़ बिकनी की बात नहीं कर रहा। और भी कई उदाहरण हैं जो दिए जा सकते हैं। जैसे कि दसवें दशक के पूर्वार्ध में बगैर दुपट्टे के कुर्तों का फैशन चला और इसने तेज़ी से गति पकड़ी। मेरे अपने बड़े भाई का मानना था कि दुपट्टा तो ज़रूर होना चाहिए चाहे जेब में लेकर चलना पड़े। मगर आज ऐसे कुरते पहनना आम बात हो गई है।

दूसरा प्रमुख कारण मेरी समझ में अपने सामाजिक परिवेश से कटा हुआ आदमी है। उदाहरण के तौर पर पहले दिल्ली को लेते हैं। दिल्ली एक ऐसा शहर है जहाँ का अपना बाशिंदा कोई नहीं है। सब दूसरी जगहों से आए हुए लोग हैं। जब लोग अपने परिवेश से कटकर नयीं जगह जाते हैं तो एक तरह के सामाजिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। ऐसे में उन्हें यह खतरा नहीं रह जाता कि जो आगे लड़की चल रही है कहीं जान-पहचान वाले की बेटी या बहन ना हो। मैं अक्सर देखता हूँ कि मेरे गाँव में लड़कियां इतनी सुरक्षित और आत्म-निर्भर क्यों हैं? (मेरा गाँव नैनीताल से आगे अल्मोड़ा में है)। क्या वे वही रह पाएँगी यदि उन्हें दिल्ली में छोड़ दिया जाए? फिर में सोचता हूँ कि मेरे गाँव के लड़के कभी लड़कियों को छेड़ते क्यों नहीं? यदि छेड़ते भी हैं तो मर्यादा क्यों नहीं पार करते? यदि उन्हें दिल्ली में छोड़ दिया जाए तो क्या वे वही रह पायेंगे जो वे गाँव में हैं? मेरे दोनों सवालों का जवाब हमेशा ना ही होता है। मैं पिछले कुछ सालों से बंगलोर में हूँ और यहाँ होने वाले सामाजिक बदलाव का साक्षी रहा हूँ। पुलिस बार बार रोती है कि बलात्कार की घटनाएँ बढ़ रही हैं। मुझे लगता है कि इसके पीछे बंगलोर जैसे छोटे से कसबे का तीव्र शहरीकरण सबसे प्रमुख कारण है। अब पहले जैसा नहीं रह गया है बंगलोर। लोग आस-पास के लोगों को नहीं जानते। शहरीकरण ने आदमी को आदमी से दूर कर दिया है, पड़ोसी को पड़ोसी से अनजान कर दिया है। एक ओर जहाँ ऐसे वातावरण से हम कई रूढियों से मुक्त हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर कई प्रकार के असंतुलनों में जकड़ भी जाते हैं। फैशन का बढाव इसका एक पक्ष है और महिलाओं के प्रति अपराध दूसरा।

अब देखना यह है कि इस विचारधारा में किस किस का योगदान है। क्या यह सिर्फ़ चंद लोगों का सोचना है या प्रशासन भी ऐसा ही सोचता है? याद आता है कि कुछ महीनों पहले गाज़ियाबाद पुलिस ने मीडिया को बुलाकर कई प्रेमी-युगलों को केमेरा के सामने खड़ा कर दिया था। वे यह संदेश देना चाहते थे कि जिन लोगों को भारत के संविधान ने वोट देने का अधिकार दिया हुआ है उन्हें इस बात कि तमीज़ नहीं कि अपना जीवन साथी कैसे चुना जाए या किसके साथ प्रेम किया जाए और किसके साथ नहीं। पुलिस पुलिस न रहकर मोरल पुलिस बनने पर उतारू हो गई। यह कोई पहली घटना नहीं थी। कुंठा सर्वव्यापी है। मुझे याद है कि में विद्यालय में था और कुछ दोस्तों के साथ सफदरजंग का मक़बरा देखने गया जोकि मेरे विद्यालय के बगल में ही था। हमें भीतर जाने के लिए टिकट नहीं दिए गए और कहा गया कि किसी बड़े आदमी को अपने साथ लाइए तभी भीतर जाने दिया जाएगा। खुशकिस्मती से एक बुज़ुर्ग हमारे पीछे खड़े थे जिन्होंने फट से कहा कि ये बच्चे मेरे साथ हैं। खैर जब अन्दर गए तो मक़बरा देखते देखते पार्क में बैठे युगलों पर नज़र पड़ी और समझ में आया कि क्यों हमें भीतर नही जाने दिया जा रहा था। सही ग़लत के फेर में न पड़ा जाए तो यहाँ एक बात गौर करने लायक थी कि कुंठा सभी के मन में थी, चाहे प्रेमी हों या टिकट देने वाला व्यक्ति या फ़िर मक़बरे में जाने वाले लोग और यह कुंठा एक दूसरे को किस हद तक प्रभावित कर रही थी।

5 टिप्पणियां:

Prashant Kumar ने कहा…

well said...
just want to add something to what you have said..
I think a lot depends on the way a person has been brought up as well. If a person has been brought up in the segregated society (where men and women form different groups) he has a higher probability of ill treating a woman. whereas those who have been brought up in the close proximity of the opposite sex knows them better. they know that its just another human being in the form of a woman.
Please correct me if you think this might not be a reason.

अखिल तिवारी ने कहा…

बहुत खूब बंधु, बहुत अच्छा लिखा है. आपने तो जैसे मेरे ही मन के विचार छीन लिए. एक बार पूरा पढ़ लिया है.अभी घर जाके इत्मीनान से पढूंगा..
शिमला वाली मांग जल्दी ही पूरी की जायेगी.. :P

अभिषेक ओझा ने कहा…

आपने तो पुरा शोध ही कर डाला, बहत अच्छा लिखा आपने... प्रशांत की बात से सहमत हूँ मैं भी, बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है की कोई इंसान कैसे परिवेश में रहा है.

प्रभाकर पाण्डेय ने कहा…

बहुत ही यथार्थ और सटीक लिखा है आपने।धन्यवाद।

Mired Mirage ने कहा…

इतना अच्छा लेख मैंने कैसे अनदेखा कर दिया ? लिंक देने के लिए धन्यवाद। यदि आपने क्लिक करने की सुविधा के सथ दिया होता तो और भी बेहतर रहता।
घुघूती बासूती

 

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